7 October 20267 min readBy Learnijoy Team
सूरदास के पद कक्षा 10: भावार्थ और प्रश्न-उत्तर (क्षितिज अध्याय 1)
भ्रमरगीत के चारों पदों का सरल भावार्थ, गोपियों के व्यंग्य का अर्थ, अलंकार और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।
कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग 2 का अध्याय 1 सूरदास के पद (Surdas ke Pad) है। इसमें सूरसागर के भ्रमरगीत से लिए गए चार पद हैं, जिनमें गोपियाँ उद्धव से बात करते हुए दिखाती हैं कि प्रेम ज्ञान से बड़ा है। इस लेख में आप हर पद का सरल भावार्थ, भाषा और अलंकार, और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे।
कवि परिचय: सूरदास
- सूरदास भक्ति काल के अष्टछाप कवियों में सबसे प्रसिद्ध हैं।
- उनका जन्म 1478 में माना जाता है। जन्मस्थान को लेकर दो मान्यताएँ हैं: मथुरा के पास रुनकता (रेणुका) क्षेत्र, या दिल्ली के पास सीही।
- वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे। मथुरा-वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहकर श्रीनाथ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे।
- मुख्य रचनाएँ: सूरसागर, साहित्य लहरी और सूर सारावली। इनमें सूरसागर सबसे लोकप्रिय है।
- उन्हें वात्सल्य और शृंगार रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ, स्वाभाविक रूप मिलता है।
भ्रमरगीत: पदों की पृष्ठभूमि
श्री कृष्ण मथुरा चले गए। वे स्वयं लौटकर नहीं आए, बल्कि अपने मित्र उद्धव के हाथ गोपियों को संदेश भेजा। उद्धव निर्गुण ब्रह्म और योग के ज्ञाता थे। गोपियों की विरह वेदना (बिछड़ने का दुख) शांत करने के लिए उन्होंने योग का उपदेश देना शुरू किया।
गोपियाँ ज्ञान मार्ग नहीं, प्रेम मार्ग को पसंद करती थीं। इसलिए उद्धव का शुष्क (नीरस) संदेश उन्हें अच्छा नहीं लगा। तभी वहाँ एक भौंरा (भ्रमर) आ गया। गोपियों ने उस भौंरे के बहाने उद्धव पर जो व्यंग्य किए, उन्हें ही भ्रमरगीत कहा जाता है। इन पदों में गोपियों का वाक्चातुर्य, यानी बोलने की कला, देखने लायक है।
पहला पद: 'ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी'
गोपियाँ उद्धव को बड़भागी (भाग्यशाली) कहती हैं, पर यह तारीफ़ नहीं, व्यंग्य है। उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से अछूते रहे, इसलिए असल में गोपियाँ उन्हें भाग्यहीन कह रही हैं।
वे उद्धव की तुलना दो चीज़ों से करती हैं:
| तुलना | गोपियों का आशय |
|---|---|
| कमल का पत्ता (पुरइनि पात) | पानी में रहकर भी पानी का दाग नहीं लगता। |
| तेल की गागर | पानी में डुबोने पर भी उस पर एक बूंद नहीं ठहरती। |
गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव ने कभी प्रेम की नदी (प्रीति-नदी) में पैर तक नहीं डुबोया। अंत में वे स्वयं को भोरी (भोली) अबला कहती हैं, जो कृष्ण के प्रेम में वैसे ही लिपटी हैं जैसे चींटियाँ गुड़ (गुर) से चिपक जाती हैं। इस पद में उपमा और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
दूसरा पद: 'मन की मन ही माँझ रही'
इस पद में गोपियाँ अपनी विरह व्यथा और निराशा बताती हैं। उनके मन की बातें मन में ही रह गईं। वे अपना दुख किसी और से कह भी नहीं सकतीं। अब तक वे कृष्ण के लौटने की अवधि (समय) को आधार (सहारा) बनाकर तन-मन की व्यथा सह रही थीं।
पर उद्धव के योग संदेश ने उनकी विरह की आग में घी का काम किया, यानी दुख घटने के बजाय और भड़क उठा। जहाँ से वे रक्षा की पुकार (गुहारि) लगाना चाहती थीं, वहीं से योग की तेज़ धारा बह निकली। गोपियाँ पूछती हैं कि जब कृष्ण ने ही मर्यादा (मरजादा) नहीं निभाई, तो वे धैर्य कैसे रखें?
तीसरा पद: हारिल की लकड़ी और कड़वी ककड़ी
गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके लिए हारिल पक्षी की लकड़ी जैसे हैं। हारिल पक्षी अपने पंजों में दबी लकड़ी कभी नहीं छोड़ता। वैसे ही गोपियों ने मन, कर्म और वचन से नंद-नंदन को हृदय में कसकर पकड़ रखा है। वे सोते-जागते, दिन-रात 'कान्ह-कान्ह' रटती रहती हैं।
उद्धव का योग उन्हें कड़वी ककड़ी (करुई ककरी) जैसा अरुचिकर लगता है। वे कहती हैं कि यह योग रूपी बीमारी (व्याधि) उन लोगों को दो जिनका मन चकरी की तरह चंचल है। गोपियों का मन तो कृष्ण के प्रेम में स्थिर है।
ध्यान दें: हारिल की लकड़ी एक बिंब है जो गोपियों के अटूट लगाव को समझाता है। इसे शब्दशः बराबरी न समझें।
चौथा पद: 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए'
अंतिम पद में गोपियाँ कृष्ण पर तंज कसती हैं कि उन्होंने अब राजनीति पढ़ ली है। वे पहले से ही चतुर थे, अब बड़े-बड़े ग्रंथ भी पढ़ लिए हैं, तभी तो स्त्रियों के लिए योग का संदेश भेजा है। वे व्यंग्य करती हैं कि पहले के लोग भले थे, जो दूसरों के भले के लिए दौड़ते फिरते थे।
गोपियाँ कृष्ण से अपना वह मन वापस माँगती हैं जिसे वे जाते समय चुरा ले गए थे। अंत में वे उद्धव को राजधर्म याद दिलाती हैं: राजा का धर्म प्रजा को सताना नहीं, उसके दुख दूर करना है। यहाँ सूरदास की लोकधर्मिता और न्यायप्रियता झलकती है। उत्तर में मधुकर शब्द का ज़िक्र करें; गोपियों ने उद्धव को इसी नाम से संबोधित किया है।
भाषा, शैली और अलंकार
- भाषा: कोमल और मधुर ब्रजभाषा।
- शैली: गेय (गाने योग्य) और मुक्तक।
- विशेषता: गोपियों की वाग्विदग्धता (बोलने की चतुराई) इन पदों का प्राण है। वे अपने तर्कों से ज्ञानी उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं।
- अनुप्रास: 'आधार आस आवन की'
- उपमा: 'ज्यों जल माहँ तेल की गागरि'
- रूपक: प्रीति-नदी
- भ्रमरगीत परंपरा के माध्यम से निर्गुण भक्ति पर सगुण भक्ति की विजय दिखाई गई है।
कठिन शब्द और याद रखें
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अधार | आधार, जीने का सहारा |
| बिथा | व्यथा, विरह का दुख |
| मरजादा | मर्यादा, प्रेम की गरिमा या वचन पालन |
| गुहारि | रक्षा की पुकार |
| करुई ककरी | कड़वी ककड़ी |
| व्याधि | बीमारी |
याद रखें:
- उद्धव निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश लाए थे।
- बड़भागी शब्द में व्यंग्य है, प्रशंसा नहीं।
- कमल का पत्ता और तेल की गागर उद्धव के लिए हैं; गुड़ से चिपकी चींटियाँ गोपियों के लिए।
- योग का संदेश विरह की आग में घी बन गया।
- सच्चा राजधर्म है: प्रजा को न सताना, उसके दुख दूर करना।
महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 1)
प्रश्न 1. गोपियों ने उद्धव को बड़भागी क्यों कहा है? क्या वे सच में उन्हें भाग्यशाली मानती हैं? उत्तर: यह एक गहरा व्यंग्य है। पद में गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम के धागे से नहीं बँधे ('अपरस रहत सनेह तगा तैं')। जो व्यक्ति प्रेम के सागर कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम न अनुभव करे, वह भाग्यशाली नहीं, अभागा है। इसलिए बड़भागी शब्द यहाँ उपहास के लिए है।
प्रश्न 2. उद्धव की तुलना किन वस्तुओं से की गई है और क्यों? उत्तर: कमल के पत्ते से, जो पानी में रहकर भी गीला नहीं होता, और तेल की गागर से, जिस पर पानी की बूंद नहीं ठहरती। उद्धव भी कृष्ण के पास रहकर उनके प्रेम से अछूते रहे।
प्रश्न 3. गोपियों ने अपनी तुलना किससे की है? उत्तर: गुड़ से चिपकी चींटियों से। जैसे चींटियाँ गुड़ से चिपक जाती हैं, वैसे ही गोपियाँ कृष्ण के प्रेम में लिपटी हैं।
प्रश्न 4. योग संदेश ने विरह की आग में घी का काम कैसे किया? उत्तर: गोपियाँ कृष्ण के लौटने की आशा में दुख सह रही थीं। उद्धव के योग संदेश से वह आशा टूटी और विरह का दुख कम होने के बजाय और बढ़ गया, जैसे घी डालने से आग भड़क उठती है।
महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 2)
प्रश्न 5. गोपियों ने कृष्ण को हारिल की लकड़ी क्यों कहा है? उत्तर: हारिल पक्षी अपने पंजों में दबी लकड़ी कभी नहीं छोड़ता। गोपियों ने भी मन, कर्म और वचन से कृष्ण को हृदय में पकड़ रखा है। यह उनके अनन्य प्रेम का प्रतीक है।
प्रश्न 6. गोपियों के अनुसार योग की शिक्षा किनके लिए है? उत्तर: उनके लिए जिनका मन स्थिर नहीं है और चकरी की तरह भटकता रहता है। गोपियों का मन कृष्ण में स्थिर है, इसलिए उन्हें योग की ज़रूरत नहीं।
प्रश्न 7. गोपियों के अनुसार सच्चा राजधर्म क्या है? उत्तर: राजा प्रजा को कभी न सताए, उसके दुख दूर करे और उसके हितों की रक्षा करे।
प्रश्न 8. इन पदों की भाषा और शैली की दो विशेषताएँ लिखिए। उत्तर: (1) भाषा कोमल और मधुर ब्रजभाषा है। (2) शैली गेय और मुक्तक है, और गोपियों की वाग्विदग्धता इन पदों को प्रभावशाली बनाती है।
आम गलतियाँ
- बड़भागी का अर्थ केवल भाग्यशाली लिखकर छोड़ देना। व्यंग्य ज़रूर समझाएँ।
- कमल के पत्ते की तुलना को गोपियों से जोड़ देना। यह तुलना उद्धव के लिए है।
- उदाहरण बिना पंक्ति के लिखना। उत्तर में दावा, पंक्ति का प्रमाण और व्याख्या, तीनों रखें।
चारों पदों को अपने शब्दों में दोहराना हो, तो Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।