01 · समझें
कवि परिचय: रवींद्रनाथ ठाकुर
रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941) भारतीय साहित्य और संस्कृति के एक महान स्तंभ थे।
रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म पाठ के परिचय के अनुसार 6 मई 1861 को बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय थे, जिन्हें उनकी काव्य कृति 'गीतांजलि' के लिए यह सम्मान मिला। उनकी शिक्षा घर पर ही हुई और उन्होंने स्वाध्याय से अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया।
उनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति और प्रकृति के प्रति गहरा लगाव झलकता है। उन्होंने लगभग एक हज़ार कविताएँ और दो हज़ार गीत लिखे। उनके संगीत को 'रवींद्र संगीत' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने शांति निकेतन जैसे अनूठे शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की।
प्रस्तुत कविता 'आत्मत्राण' मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थी, जिसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है। यह अनुवाद मूल रचना की आत्मा को सुरक्षित रखने में सफल रहा है।
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रवींद्रनाथ ठाकुर को किस कृति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला?
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02 · समझें
कविता का मुख्य भाव
कवि ईश्वर से संकट हटाने के बजाय उनका सामना करने का साहस माँगते हैं। आत्मबल और आस्था यहाँ साथ चलते हैं।
आमतौर पर प्रार्थनाओं में हम ईश्वर से अपने कष्टों को हरने या दुखों को समाप्त करने की विनती करते हैं। लेकिन 'आत्मत्राण' में कवि कहता है कि वह विपदाओं से डरना नहीं चाहता। वह ईश्वर से यह नहीं कहता कि उसे मुसीबतों से बचा लिया जाए, बल्कि वह उन मुसीबतों का सामना करने का साहस माँगता है।
कवि का मानना है कि जीवन में संघर्ष अनिवार्य है। जैसे एक तैराक तभी सफल होता है जब वह स्वयं हाथ-पाँव चलाता है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन की लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। ईश्वर केवल आत्मबल और मानसिक शक्ति प्रदान करने वाले सहायक के रूप में देखे गए हैं।
आत्मत्राण का संदेश
- 1
विपदा
जीवन में आने वाली चुनौतियाँ और दुख।
- 2
प्रार्थना
दुख दूर करने की नहीं, बल्कि साहस पाने की विनती।
- 3
आत्मबल
स्वयं के पुरुषार्थ और शक्ति पर विश्वास।
- 4
निर्भय प्रयास
संकट में साहस बनाए रखकर आगे बढ़ना।
यह प्रवाह दिखाता है कि कैसे कवि विपदाओं के बीच ईश्वर से केवल साहस और आत्मबल की अपेक्षा करता है।
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कवि विपदाओं के बारे में क्या प्रार्थना करता है?
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03 · समझें
दुख और संघर्ष पर विजय
कवि दुख के समय सांत्वना की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उस पर विजय पाने की शक्ति चाहता है।
कवि कहता है कि यदि उसका मन दुख-ताप (कष्ट की पीड़ा) से व्यथित (दुखी) हो, तो वह ईश्वर से यह नहीं चाहता कि ईश्वर उसे केवल दिलासा दे। उसकी इच्छा केवल इतनी है कि वह अपने दुख पर विजय प्राप्त कर सके। वह अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहता है।
जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हमें कोई सहायक (मददगार) नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसका अपना बल और पौरुष (पराक्रम) न डगमगाए। वह अकेले ही अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम होना चाहता है।
अपने बल की कामना का अर्थ मदद माँगना गलत होना नहीं है। कविता कठिन समय में मन का साहस बनाए रखने की प्रार्थना है।
| कठिन शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विपदा | मुसीबत या आपत्ति |
| व्यथित | दुखी या कष्ट में |
| पौरुष | पराक्रम या पुरुषार्थ |
| सांत्वना | ढाँढस बँधाना या दिलासा देना |
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सहायक न मिलने पर कवि क्या चाहता है?
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04 · समझें
हानि में भी अडिग विश्वास
संसार में हानि होने या धोखा मिलने पर भी कवि अपने मन की शक्ति को बनाए रखना चाहता है।
कवि कहता है कि यदि इस संसार में उसे केवल हानि ही उठानी पड़े और लाभ के नाम पर केवल वंचना (धोखा) ही मिले, तब भी उसका मन हार न माने। वह चाहता है कि उसके मन में कभी 'क्षय' (नाश) का भाव न आए। वह अपनी आंतरिक शक्ति को हर हाल में सुरक्षित रखना चाहता है।
यहाँ 'आत्मत्राण' शब्द का अर्थ है - स्वयं का बचाव या भय से मुक्ति। कवि ईश्वर से यह नहीं कह रहा कि वे उसे प्रतिदिन बचाते रहें, बल्कि वह 'तरने' (पार उतरने) की ऐसी शक्ति चाहता है जो उसे स्वस्थ और निर्भय रखे।
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वंचना मिलने पर कवि की क्या प्रतिक्रिया है?
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