Class 10 · Hindi · Chapter 9 · NCERT Class 10 Hindi – Sparsh Bhag 2

डायरी का एक पन्ना कक्षा 10 नोट्स

मुफ़्त: पूरा माइंड मैप और अध्याय के पहले 5 भाग। बाकी 4 भाग मुफ़्त अकाउंट से।

माइंड मैप

पूरे अध्याय की मुख्य बातें एक नज़र में।

डायरी का एक पन्ना

सीताराम सेकसरिया द्वारा 26 जनवरी 1931 को कलकत्ता में स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ का आँखों देखा विवरण।

  1. लेखक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    सीताराम सेकसरिया की डायरी से संकलित अंश जो 1931 के स्वतंत्रता संग्राम की वास्तविक घटनाओं को दर्शाता है।

    • सीताराम सेकसरिया — नवलगढ़ में जन्मे, कलकत्ता निवासी, आज़ाद हिंद फ़ौज के मंत्री और 'एक कार्यकर्ता की डायरी' के लेखक।
    • 26 जनवरी का महत्व — 1930 में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता दिवस मनाया गया; 1931 में इसकी पहली वर्षगांठ (पुनरावृत्ति) थी।
    • कलकत्ता का कलंक — शहर पर आंदोलन में निष्क्रियता का आरोप था; आयोजन का उद्देश्य इस छवि को सुधारना और ₹2000 प्रचार पर खर्च करना था।
  2. शहर की सजावट और पुलिस की तैयारी

    कलकत्ता में उत्सव जैसा माहौल और उसके जवाब में ब्रिटिश पुलिस की सख्त घेराबंदी।

    • राष्ट्रीय ध्वज और सजावट — बड़ा बाज़ार के मकानों पर झंडे फहराए गए; शहर में ऐसा उत्साह था मानो स्वतंत्रता मिल गई हो।
    • पुलिस की घेराबंदी — घुड़सवार पुलिस और सार्जेंट तैनात; पार्कों और मैदानों को सुबह से घेरा गया ताकि सभा न हो सके।
  3. सुबह की घटनाएँ और गिरफ्तारियाँ

    पुलिस के कड़े पहरे के बावजूद विभिन्न स्थानों पर झंडोत्सव और दमन।

    • श्रद्धानंद पार्क की घटना — अविनाश बाबू (बंगाल प्रांतीय विद्यार्थी संघ मंत्री) ने झंडा गाड़ा; पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लाठियाँ चलाईं।
    • बालिका विद्यालय का उत्सव — मारवाड़ी बालिका विद्यालय में जानकीदेवी और मदालसा की उपस्थिति में झंडोत्सव मनाया गया।
  4. खुली चुनौती: पुलिस बनाम कौंसिल

    ब्रिटिश प्रशासन के निषेधाज्ञा के विरुद्ध स्वतंत्रता सेनानियों का खुला विद्रोह।

    • पुलिस कमिश्नर का नोटिस — धाराओं के तहत सभा करना अपराध घोषित किया गया और शामिल होने वालों को दोषी माना गया।
    • कौंसिल की चुनौती — 4:24 बजे मोनुमेंट के नीचे झंडा फहराने और प्रतिज्ञा पढ़ने का खुला आह्वान; इसे 'ओपन लड़ाई' कहा गया।
  5. सुभाष बाबू का जुलूस और लाठीचार्ज

    मैदान की ओर बढ़ते जुलूस पर पुलिस की बर्बरता और क्रांतिकारियों का साहस।

    • जुलूस का प्रस्थान — ठीक 4:10 बजे सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भीड़ चौरंगी से आगे बढ़ी।
    • पुलिसिया बर्बरता — मैदान के मोड़ पर लाठीचार्ज; सुभाष बाबू पर लाठियाँ पड़ीं और क्षितीश चटर्जी का सिर फट गया।
    • अदम्य संकल्प — खून बहने के बावजूद लोग पीछे नहीं हटे और 'वंदे मातरम्' के नारे लगाते रहे।
  6. नारी शक्ति का प्रदर्शन

    आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और उनकी ऐतिहासिक गिरफ्तारियाँ।

    • मोनुमेंट पर झंडा — पुरुषों पर लाठीचार्ज के दौरान महिलाएँ सीढ़ियों पर चढ़ गईं, झंडा फहराया और प्रतिज्ञा पढ़ी।
    • विमल प्रतिभा का नेतृत्व — महिलाओं का जत्था आगे बढ़ा; बहू बाज़ार मोड़ पर रोका गया; कुल 105 महिलाएँ गिरफ्तार हुईं।
    • लालबाज़ार लॉकअप — गिरफ्तार महिलाओं को लॉकअप भेजा गया और रात 9 बजे रिहा किया गया; यह एक रिकॉर्ड था।
  7. परिणाम और साक्ष्य

    आंदोलन का प्रभाव और पुलिस की बर्बरता के दस्तावेजीकरण के प्रयास।

    • घायलों का विवरण — अस्पताल में 160 घायल पहुँचे; लेखक के अनुसार कुल संख्या 200 के करीब थी।
    • डॉ. दासगुप्ता का कार्य — उन्होंने घायलों के फोटो खिंचवाए ताकि दुनिया को ब्रिटिश दमन का साक्ष्य दिखाया जा सके।
    • अपूर्व उपलब्धि — कलकत्ता का कलंक धुल गया; जनता में संगठित होकर दमन का सामना करने का विश्वास जगा।

अध्याय के नोट्स

सीताराम सेकसरिया द्वारा लिखित यह पाठ 26 जनवरी 1931 के ऐतिहासिक दिन का सजीव वर्णन करता है, जब कलकत्ता के लोगों ने ब्रिटिश दमन के बावजूद भारत का दूसरा स्वतंत्रता दिवस मनाया।

लेखक परिचय: सीताराम सेकसरिया

सीताराम सेकसरिया (1892-1982) एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता थे।

सीताराम सेकसरिया का जन्म राजस्थान के नवलगढ़ में हुआ था, लेकिन उनका अधिकांश जीवन कलकत्ता (अब कोलकाता) में बीता। वे व्यापार से जुड़े होने के साथ-साथ कई साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के संस्थापक भी रहे।

महात्मा गांधी के आह्वान पर वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज के मंत्री के रूप में भी कार्य किया और जेल यात्राएं भी कीं। उनकी प्रमुख कृतियों में 'एक कार्यकर्ता की डायरी' अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिससे यह पाठ लिया गया है।

उनकी उल्लेखनीय कृतियों में दो भागों में “एक कार्यकर्ता की डायरी” है। इस पाठ में 26 जनवरी 1931 की डायरी-प्रविष्टि के माध्यम से कलकत्ता की घटनाएँ सामने आती हैं।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 26 जनवरी का महत्व

26 जनवरी 1931 का दिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक विशेष स्थान रखता है।

26 जनवरी 1930 को गुलाम भारत में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। 1931 में इसी दिन की पहली वर्षगांठ थी, जिसे 'पुनरावृत्ति' कहा गया है। लेखक बताते हैं कि इस वर्ष कलकत्ता में इसकी तैयारी बहुत बड़े स्तर पर की गई थी।

कलकत्ता पर अक्सर यह आरोप लगता था कि वहाँ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए पर्याप्त काम नहीं हो रहा है। इस दिन के आयोजन का एक उद्देश्य इस 'कलंक' को धोना भी था।

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प्रश्न

1931 के स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों पर कितना खर्च किया गया था?

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कलकत्ता का दृश्य और पुलिस की सख्ती

पूरा कलकत्ता शहर राष्ट्रीय ध्वजों से सजा हुआ था और उत्सव जैसा माहौल था।

बड़ा बाज़ार के मकानों पर राष्ट्रीय झंडे फहरा रहे थे। कई मकानों को इतनी सुंदरता से सजाया गया था कि ऐसा लगता था मानो स्वतंत्रता मिल गई हो। शहर के हर हिस्से में उत्साह और नवीनता का संचार था।

दूसरी ओर, ब्रिटिश पुलिस भी पूरी ताकत के साथ तैनात थी। घुड़सवार पुलिस और सार्जेंट हर मोड़ पर मौजूद थे। बड़े पार्कों और मैदानों को पुलिस ने सुबह से ही घेर लिया था ताकि लोग वहाँ इकट्ठा न हो सकें।

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पुलिस ने पार्कों और मैदानों को क्यों घेरा था?

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सुबह की घटनाएँ और गिरफ्तारियाँ

पुलिस के कड़े पहरे के बावजूद देशभक्तों ने कई स्थानों पर झंडा फहराया।

श्रद्धानंद पार्क में बंगाल प्रांतीय विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू ने झंडा गाड़ा, तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और लोगों पर लाठियाँ चलाईं। तारा सुंदरी पार्क में भी झंडा फहराने की कोशिश के दौरान काफी मारपीट हुई।

मारवाड़ी बालिका विद्यालय की लड़कियों ने भी अपने विद्यालय में झंडोत्सव मनाया। वहाँ जानकीदेवी और मदालसा जैसी महिलाएँ भी मौजूद थीं। लड़कियों को उत्सव का महत्व समझाया गया, जिससे पता चलता है कि आंदोलन में बच्चों और महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी थी।

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अविनाश बाबू के साथ पुलिस ने क्या किया?

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खुली चुनौती: पुलिस बनाम कौंसिल

शाम की सभा के लिए पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच सीधा टकराव तय था।

पुलिस कमिश्नर ने नोटिस जारी किया था कि किसी भी तरह की सभा करना कानूनी अपराध होगा और शामिल होने वालों को दोषी माना जाएगा। इसके जवाब में कौंसिल (स्वतंत्रता सेनानियों की परिषद) ने नोटिस निकाला कि मोनुमेंट के नीचे ठीक 4:24 बजे झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

लेखक इसे एक 'ओपन लड़ाई' या खुली चुनौती कहते हैं क्योंकि पहली बार ब्रिटिश कानून को इतनी स्पष्टता और साहस के साथ चुनौती दी गई थी।

पक्षनोटिस का मुख्य बिंदु
पुलिस कमिश्नरधाराओं के तहत सभा करना मना है; शामिल होने वाले दोषी होंगे।
कौंसिल4:24 बजे मोनुमेंट पर झंडा फहराया जाएगा; आम जनता सादर आमंत्रित है।

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प्रश्न

लेखक ने इस सभा को 'ओपन लड़ाई' क्यों कहा है?

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आगे का अध्याय

डायरी का एक पन्ना — बाकी अध्याय मुफ़्त में पढ़ें

  1. Locked: 1. सुभाष बाबू का जुलूस और लाठीचार्ज
  2. Locked: 2. नारी शक्ति का प्रदर्शन
  3. Locked: 3. परिणाम और ऐतिहासिक उपलब्धि
  4. Locked: 4. उत्तर-लेखन कला: एक उदाहरण

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