01 · समझें
कवयित्री परिचय: मीराबाई
मीराबाई मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की एक प्रमुख कवयित्री थीं, जिनकी भक्ति में प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा देखने को मिलती है।
मीराबाई का जन्म 1503 में जोधपुर के चौकड़ी (कुड़की) गाँव में हुआ था। उनका विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र कुँवर भोजराज से हुआ था। मीरा का जीवन दुखों से भरा रहा; बचपन में ही माँ का देहांत हो गया और विवाह के कुछ वर्षों बाद पति, पिता और ससुर का भी देहांत हो गया।
सांसारिक जीवन से निराश होकर मीरा ने घर-परिवार त्याग दिया और वृंदावन में बस गईं। वे पूरी तरह से 'गिरधर गोपाल' कृष्ण के प्रति समर्पित हो गईं। उनकी भक्ति में 'दैन्य' (स्वयं को छोटा मानना) और 'माधुर्य' (प्रेम भाव) का मिश्रण है।
मीरा की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का सुंदर मिश्रण मिलता है। इसके अलावा उनके पदों में पंजाबी, खड़ी बोली और पूर्वी हिंदी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। वे संत रैदास की शिष्या मानी जाती हैं।
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मीराबाई की भक्ति किस भाव की है?
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02 · समझें
प्रथम पद: संकटमोचन कृष्ण से प्रार्थना
पहले पद में मीरा अपने आराध्य देव कृष्ण से अपनी पीड़ा दूर करने की विनती करती हैं और उन्हें उनके रक्षक रूप की याद दिलाती हैं।
मीरा कृष्ण को 'हरि' कहकर संबोधित करती हैं और कहती हैं कि जिस प्रकार आपने अपने अन्य भक्तों के कष्ट हरे हैं, वैसे ही मेरे कष्ट भी दूर करें। यहाँ मीरा कृष्ण के सामर्थ्य पर विश्वास प्रकट करती हैं।
मीरा भक्तिपरंपरा के द्रौपदी-प्रसंग का स्मरण करती हैं: संकट में वस्त्र बढ़ाकर उनकी लाज की रक्षा हुई। इस उदाहरण से वे अपने आराध्य के रक्षक रूप पर विश्वास व्यक्त करती हैं।
| भक्तिपरंपरा का प्रसंग | पद में रक्षा का वर्णन |
|---|---|
| द्रौपदी | चीर (वस्त्र) बढ़ाकर अपमान से रक्षा की। |
| प्रह्लाद | नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकशिपु से रक्षा की। |
| गजराज | मगरमच्छ के चंगुल से छुड़ाकर जीवन दान दिया। |
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मीरा ने द्रौपदी का उदाहरण क्यों दिया है?
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03 · समझें
प्रथम पद का भावार्थ और शिल्प
इस पद में मीरा ने कृष्ण के विभिन्न अवतारों और उनकी कृपा का वर्णन किया है।
मीरा प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरहरि रूप और गजराज को मगरमच्छ से बचाने की भक्तिपरंपरा की कथाएँ याद करती हैं। पाठ की शब्दार्थ सूची गजराज का अर्थ ऐरावत देती है। ये प्रसंग उनके आराध्य के रक्षक रूप पर विश्वास व्यक्त करते हैं।
पद के अंत में मीरा स्वयं को 'गिरधर' की दासी बताते हुए प्रार्थना करती हैं कि 'हरो म्हारी भीर', अर्थात मेरी पीड़ा को भी दूर करो। यहाँ 'भीर' का अर्थ कष्ट या दुख है।
काव्य-सौंदर्य: इस पद में 'अनुप्रास अलंकार' का प्रयोग हुआ है (जैसे: 'काटी कुंजर')। भाषा सरल राजस्थानी मिश्रित ब्रज है और शैली विनीत प्रार्थना की है।
| कठिन शब्द | अर्थ |
|---|---|
| हरि | भगवान कृष्ण |
| भीर | पीड़ा / कष्ट |
| चीर | वस्त्र |
| कुंजर | हाथी |
| धर्यो | धारण किया |
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'काटी कुंजर पीर' पंक्ति का क्या अर्थ है?
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द्वितीय पद: चाकरी की अभिलाषा
दूसरे पद में मीरा कृष्ण के समीप रहने के लिए उनकी दासी या 'चाकर' बनने की इच्छा व्यक्त करती हैं।
मीरा कृष्ण से कहती हैं कि 'स्याम म्हाने चाकर राखो जी', अर्थात हे श्याम, मुझे अपनी दासी बना लीजिए। वे कृष्ण की सेवा इसलिए करना चाहती हैं ताकि वे हर समय उनके दर्शन पा सकें।
चाकर बनकर मीरा कृष्ण के लिए बाग लगाएँगी ताकि जब कृष्ण वहाँ टहलने आएँ, तो वे रोज़ सुबह उनके दर्शन कर सकें। वे वृंदावन की कुंज गलियों में कृष्ण की लीलाओं का गुणगान करना चाहती हैं।
मीरा सेवा और पारिश्रमिक की भाषा को भक्ति का रूप देती हैं। उनके लिए वास्तविक धन नहीं, दर्शन, स्मरण और प्रेमपूर्ण भक्ति ही प्राप्ति हैं।
| सेवा से जुड़ा शब्द | मीरा का भाव |
|---|---|
| पारिश्रमिक | कृष्ण के दर्शन |
| खर्ची | कृष्ण का स्मरण |
| जागीर | भाव-भक्ति |
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प्रश्न
मीरा कृष्ण की चाकरी क्यों करना चाहती हैं?
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