01 · समझें
कवि परिचय: सुमित्रानंदन पंत
सुमित्रानंदन पंत (1900-1977) हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।
पंत जी का जन्म उत्तराखंड के कौसानी (अल्मोड़ा) में हुआ था। प्रकृति के आँचल में पलने के कारण उनकी कविताओं में प्रकृति प्रेम और सौंदर्य कूट-कूट कर भरा है। उन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' भी कहा जाता है।
उनकी प्रमुख कृतियों में वीणा, पल्लव, युगवाणी और चिदंबरा शामिल हैं। उन्हें हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी शैली कोमल, मधुर और उपमाओं से सजी होती है।
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प्रश्न
सुमित्रानंदन पंत को किस प्रकार का कवि कहा जाता है?
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02 · समझें
प्रकृति का पल-पल बदलता वेश
कविता की शुरुआत वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश के निरंतर बदलते दृश्यों से होती है।
कवि कहते हैं कि पर्वत प्रदेश में पावस (वर्षा ऋतु) के समय प्रकृति हर पल अपना रूप बदल रही है। कभी धूप खिलती है, तो कभी अचानक घने बादल छा जाते हैं।
यहाँ 'प्रकृति-वेश' का अर्थ है प्रकृति का पहनावा या रूप। कवि ने प्रकृति का मानवीकरण किया है, जैसे वह कोई जीवित स्त्री हो जो बार-बार अपने वस्त्र बदल रही हो।
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प्रश्न
कविता में 'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' का क्या अर्थ है?
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03 · समझें
मेखलाकार पर्वत और पुष्प-रूपी नेत्र
कवि ने विशाल पर्वत की तुलना एक करधनी से की है जो धरती को घेरे हुए है।
पर्वत 'मेखलाकार' (करधनी के आकार का) है। उस पर खिले हज़ारों फूल ऐसे लग रहे हैं जैसे वे पर्वत की आँखें हों। कवि ने यहाँ 'दृग-सुमन' (पुष्प रूपी आँखें) पद का प्रयोग किया है, जो रूपक अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
पर्वत इन हज़ारों आँखों से नीचे फैले तालाब के स्वच्छ जल में अपना विशाल आकार देख रहा है। ऐसा लगता है मानो पर्वत आत्म-मुग्ध होकर अपनी ही सुंदरता को निहार रहा हो।
| दृश्य | कवि की कल्पना |
|---|---|
| मेखलाकार पर्वत | कमरबंद की तरह गोल और विशाल पहाड़। |
| हज़ार दृग-सुमन | पहाड़ पर खिले हज़ारों फूल जो आँखों की तरह प्रतीत होते हैं। |
| दर्पण रूपी ताल | पहाड़ के चरणों में स्थित तालाब जो आईने का काम कर रहा है। |
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प्रश्न
'मेखलाकार' शब्द का प्रयोग कवि ने क्यों किया है?
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04 · समझें
झरनों का संगीत और गौरव गान
पहाड़ों से गिरते झरने केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि पर्वत की महानता के गायक हैं।
झरने 'झर-झर' की आवाज़ करते हुए बह रहे हैं। कवि को लगता है कि वे पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं। उनकी आवाज़ सुनकर नस-नस में उत्तेजना और उत्साह भर जाता है।
इन झरनों की तुलना 'मोती की लड़ियों' से की गई है। झाग से भरे ये सफेद झरने ऐसे लगते हैं जैसे मोतियों की मालाएँ पहाड़ के गले से लटक रही हों। यहाँ उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
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प्रश्न
झरनों की तुलना किससे की गई है और क्यों?
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