01 · समझें
कवि परिचय: नागार्जुन
नागार्जुन (1911-1998) हिंदी और मैथिली साहित्य के एक प्रमुख स्तंभ हैं, जिन्हें 'आधुनिक कबीर' भी कहा जाता है।
नागार्जुन का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में प्राप्त की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए बनारस और कोलकाता गए। वे घुमक्कड़ी स्वभाव के थे और उन्होंने संपूर्ण भारत की अनेक बार यात्रा की।
वे जन-जीवन से गहरे सरोकार रखने वाले कवि थे। उन्होंने भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वार्थ और समाज की पतनशील स्थितियों पर तीखा प्रहार किया। उनकी कविताओं में छंदबद्ध और मुक्त छंद, दोनों ही शैलियाँ मिलती हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में 'युगधारा', 'सतरंगे पंखों वाली' और 'हज़ार-हज़ार बाँहों वाली' शामिल हैं।
नागार्जुन मैथिली में यात्री नाम से भी लिखते थे। इस परिचय से उनकी साहित्यिक पहचान और भाषा-संसार को समझने में सहायता मिलती है।
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नागार्जुन को 'आधुनिक कबीर' क्यों कहा जाता है?
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02 · समझें
यह दंतुरित मुस्कान: जीवन का संदेश
इस कविता में कवि ने एक छोटे बच्चे के नए-नए निकले दाँतों वाली मुस्कान के सौंदर्य और उसके जादुई प्रभाव का वर्णन किया है।
कवि कहते हैं कि बच्चे की यह 'दंतुरित मुस्कान' (छोटे-छोटे नए दाँतों वाली हँसी) इतनी प्रभावशाली है कि यह किसी मृतक में भी जान डाल सकती है। यहाँ 'मृतक' शब्द का प्रयोग कवि ने उन लोगों के लिए किया है जो जीवन की निराशा और हताशा के कारण जड़ हो चुके हैं। बच्चे की मुस्कान देखकर उनके भीतर भी जीवन का संचार हो जाता है।
कवि ने बच्चे के धूल से सने शरीर (धूलि-धूसर गात) की तुलना तालाब छोड़कर झोपड़ी में खिले कमल (जलजात) से की है। यह बिंब दर्शाता है कि अभावों के बीच भी बच्चे की उपस्थिति खुशियाँ बिखेर देती है। कवि का मानना है कि बच्चे का स्पर्श इतना कोमल और प्राणवान है कि कठोर पत्थर (पाषाण) जैसा हृदय भी पिघलकर जल बन जाए।
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प्रश्न
बच्चे की मुस्कान का 'कठोर पाषाण' पर क्या प्रभाव पड़ता है?
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03 · समझें
अपरिचित पिता और माँ का माध्यम
कवि स्वयं को एक 'अतिथि' और 'चिर प्रवासी' मानते हैं, जो अपने ही बच्चे के लिए अनजान है।
कवि लंबे समय तक घर से बाहर रहने के कारण बच्चे के लिए एक अजनबी की तरह हैं। बच्चा उन्हें पहचान नहीं पाता और अपलक (अनिमेष) देखता रहता है। कवि को लगता है कि यदि माँ माध्यम न बनी होती, तो वे अपने ही बच्चे की इस सुंदर मुस्कान को कभी देख और जान नहीं पाते।
यहाँ माँ के प्रेम को 'मधुपर्क' (पंचामृत) के समान बताया गया है, जो बच्चे को आत्मीयता और जीवन की मिठास प्रदान करता है। जब बच्चा तिरछी नज़रों (कनखी) से कवि को देखता है और दोनों की आँखें मिलती हैं (आँखें चार होना), तब उसकी मुस्कान कवि के हृदय को मोह लेती है और उसे अत्यंत 'छविमान' (सुंदर) लगती है।
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प्रश्न
कवि ने स्वयं को 'अतिथि' क्यों कहा है?
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04 · समझें
काव्य सौंदर्य और शिल्प
कविता की भाषा सरल, सहज और बिंबों से सजी हुई है।
शिशु के धूल से सने शरीर और झोपड़ी में कमल खिलने की कल्पना से दृश्य-बिंब बनते हैं। मुसकान कठोरता को कोमलता में बदलती हुई दिखाई देती है। बाँस-बबूल और शेफालिका के फूलों के विरोधी बिंब नीरसता से आनंद की ओर बदलाव को स्पष्ट करते हैं। बिना स्पष्ट प्रमाण हर बिंब को किसी एक अलंकार का नाम देना आवश्यक नहीं है।
कविता का स्वर वात्सल्य रस से ओत-प्रोत है। कवि ने 'दंतुरित मुस्कान' को जीवन की जीवंतता का प्रतीक माना है। भाषा में तत्सम शब्दों के साथ-साथ बोलचाल के शब्दों का भी सुंदर तालमेल है।
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प्रश्न
शिशु के स्पर्श से 'बाँस और बबूल' का क्या अर्थ है?
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