7 October 20266 min readBy Learnijoy Team

आत्मत्राण कक्षा 10: भावार्थ और प्रश्न-उत्तर (स्पर्श अध्याय 7)

रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता आत्मत्राण का सरल भावार्थ, शीर्षक की सार्थकता, कठिन शब्द और बोर्ड परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श भाग 2 का अध्याय 7 आत्मत्राण (Atmatran) है, जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा है। यह एक अनोखी प्रार्थना है: कवि ईश्वर से दुख दूर करने की नहीं, बल्कि दुखों से लड़ने की शक्ति माँगते हैं। इस लेख में आप कविता का भावार्थ, शीर्षक की सार्थकता, कठिन शब्द और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे।

कवि परिचय: रवींद्रनाथ ठाकुर

  • रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941) भारतीय साहित्य और संस्कृति के महान स्तंभ थे। उनका जन्म बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ।
  • वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय थे। यह सम्मान उन्हें काव्य कृति गीतांजलि के लिए मिला।
  • उनकी शिक्षा घर पर हुई और उन्होंने स्वाध्याय से अनेक विषयों का ज्ञान पाया।
  • उन्होंने लगभग एक हज़ार कविताएँ और दो हज़ार गीत लिखे। उनका संगीत रवींद्र संगीत कहलाता है।
  • उन्होंने शांति निकेतन जैसे अनोखे शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की।
  • आत्मत्राण मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थी। इसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।

कविता का मुख्य भाव

आमतौर पर प्रार्थना में हम ईश्वर से कष्ट हरने की विनती करते हैं। आत्मत्राण में कवि कहते हैं कि वे विपदाओं से डरना नहीं चाहते। वे यह नहीं माँगते कि उन्हें मुसीबतों से बचा लिया जाए; वे मुसीबतों का सामना करने का साहस माँगते हैं।

कवि मानते हैं कि जीवन में संघर्ष अनिवार्य है। जैसे तैराक तभी सफल होता है जब वह स्वयं हाथ-पाँव चलाता है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन की लड़ाई ख़ुद लड़नी पड़ती है। यहाँ ईश्वर आत्मबल और मानसिक शक्ति देने वाले सहायक के रूप में देखे गए हैं।

संदेश का क्रम: विपदा (जीवन की चुनौतियाँ) → प्रार्थना (दुख हटाने की नहीं, साहस पाने की) → आत्मबल (अपनी शक्ति पर विश्वास) → निर्भय प्रयास (संकट में भी आगे बढ़ना)।

भावार्थ: दुख पर विजय और अपना बल

कवि कहते हैं कि यदि उनका मन दुख-ताप से व्यथित हो, तो वे ईश्वर से केवल सांत्वना (दिलासा) नहीं चाहते। उनकी इच्छा बस इतनी है कि वे अपने दुख पर विजय पा सकें और उनका आत्मविश्वास बना रहे।

जीवन में कई बार कोई सहायक नहीं मिलता। तब कवि प्रार्थना करते हैं कि उनका अपना बल और पौरुष (पराक्रम) न डगमगाए, ताकि वे अकेले भी अपनी लड़ाई लड़ सकें। ध्यान दें: अपने बल की कामना का अर्थ यह नहीं कि मदद माँगना गलत है। यह कठिन समय में मन का साहस बनाए रखने की प्रार्थना है।

भावार्थ: हानि और वंचना में भी अडिग मन

यदि संसार में केवल हानि ही उठानी पड़े और लाभ के नाम पर केवल वंचना (धोखा) मिले, तब भी कवि चाहते हैं कि उनका मन हार न माने। उनके मन में कभी क्षय (नाश) का भाव न आए।

कवि ईश्वर से यह नहीं कहते कि वे उन्हें रोज़ बचाते रहें। वे तरने (पार उतरने) की ऐसी शक्ति चाहते हैं जो उन्हें स्वस्थ और निर्भय रखे। इसी भाव में पंक्ति है: 'तरने की हो शक्ति अनामय'।

भावार्थ: सुख में विनम्रता, दुख में विश्वास

सुख के दिनों में कवि नत शिर (सिर झुकाकर) हर क्षण ईश्वर का मुख पहचानना चाहते हैं। यानी सुख मिलने पर वे अहंकारी न बनें, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ और विनम्र रहें।

जब दुख-रात्रि (कष्ट का समय) आए और सारी दुनिया धोखा दे, तब भी उनका ईश्वर पर विश्वास न डिगे और मन में कोई संशय (संदेह) न आए। वे अपनी परिस्थितियों के लिए ईश्वर को दोष नहीं देते।

काव्य सौंदर्य और कठिन शब्द

  • भाषा सरल, गंभीर और भावपूर्ण है।
  • ईश्वर के लिए करुणामय संबोधन आया है।
  • दुख-रात्रि और नत शिर जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग है।
  • स्वर ओजपूर्ण है, जो पाठक में साहस भरता है। बार-बार लौटती प्रार्थना आत्मबल की माँग को स्पष्ट करती है।
  • यह केवल धार्मिक प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और साहस का जीवन-दर्शन है।
शब्दअर्थ
विपदामुसीबत, आपत्ति
व्यथितदुखी, कष्ट में
सांत्वनादिलासा, ढाँढस
पौरुषपराक्रम, पुरुषार्थ
वंचनाधोखा
क्षयनाश
नत शिरसिर झुकाकर
संशयसंदेह

महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 1)

प्रश्न 1. रवींद्रनाथ ठाकुर को किस कृति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला? उत्तर: काव्य कृति गीतांजलि के लिए।

प्रश्न 2. कवि विपदाओं के बारे में क्या प्रार्थना करते हैं? उत्तर: वे प्रार्थना करते हैं कि उन्हें विपदाओं से बचाया न जाए, बल्कि इतना साहस मिले कि वे विपदाओं में कभी भयभीत न हों।

प्रश्न 3. सहायक न मिलने पर कवि क्या चाहते हैं? उत्तर: कि उनका आत्मबल और पौरुष कभी कम न हो और वे स्वयं संकट का सामना कर सकें।

प्रश्न 4. वंचना मिलने पर कवि की क्या कामना है? उत्तर: धोखा मिलने पर भी उनका मन हार न माने और वे मानसिक रूप से कमज़ोर न हों।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 2)

प्रश्न 5. नत शिर होकर सुख के दिन बिताने का क्या तात्पर्य है? उत्तर: सुख के समय कवि विनम्र रहना चाहते हैं और हर पल ईश्वर की कृपा स्वीकार करना चाहते हैं, ताकि उनमें अहंकार न आए।

प्रश्न 6. कविता में करुणामय किसे कहा गया है? उत्तर: ईश्वर को, जिनसे कवि शक्ति और साहस की प्रार्थना कर रहे हैं।

प्रश्न 7. आत्मत्राण का अर्थ क्या है? उत्तर: स्वयं का भय से निवारण, बचाव, या अपनी रक्षा स्वयं करने की शक्ति पाना।

प्रश्न 8. आत्मत्राण शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। उत्तर: दावा: शीर्षक पूरी तरह सार्थक है। साक्ष्य: कवि ईश्वर से बाहरी संकटों से बचाने की नहीं, अपने भय से मुक्ति और आत्म-रक्षा की शक्ति की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं, 'तरने की हो शक्ति अनामय' और 'दुख को मैं कर सकूँ सदा जय'। व्याख्या: शीर्षक बताता है कि बचाव बाहर से नहीं, मनुष्य के भीतर के साहस और विश्वास से आता है।

आम गलतियाँ

  • यह लिखना कि कवि दुख दूर करने की प्रार्थना करते हैं। वे दुख सहने और जीतने की शक्ति माँगते हैं।
  • कविता को ईश्वर से दूरी या अविश्वास की कविता समझना। कवि का विश्वास दुख-रात्रि में भी अडिग है।
  • अपने बल की कामना को मदद माँगने का विरोध समझना। यह मन का साहस बनाए रखने की प्रार्थना है।

कविता का भाव अपने शब्दों में फिर से दोहराना हो, तो Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।