7 October 20267 min readBy Learnijoy Team

बालगोबिन भगत कक्षा 10: क्षितिज भाग 2 अध्याय 8 सार और प्रश्न-उत्तर

रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र का पूरा सार, भगत का चरित्र, पाठ का संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर एक ही जगह।

कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग 2 का अध्याय 8 "बालगोबिन भगत" (Balgobin Bhagat) रामवृक्ष बेनीपुरी का लिखा एक रेखाचित्र है। इस लेख में आप पाठ का शुरू से अंत तक सार, भगत के चरित्र की विशेषताएँ, पाठ का संदेश और परीक्षा के लिए उपयोगी प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे। यह पाठ बताता है कि कोई गृहस्थ भी अपने आचरण से सच्चा साधु हो सकता है।

लेखक परिचय: रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 1899 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो गया, इसलिए उनका शुरुआती जीवन अभावों और संघर्षों में बीता। वे 1920 में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और कई बार जेल भी गए।

उनकी अनूठी और प्रभावशाली लेखन शैली के कारण उन्हें 'कलम का जादूगर' कहा जाता है। उनकी रचनाओं में स्वाधीनता की चेतना, मनुष्यता की चिंता और इतिहास की युगानुरूप व्याख्या मिलती है। 'माटी की मूरतें' उनका प्रसिद्ध रेखाचित्र संग्रह है। बालगोबिन भगत भी इसी विधा की रचना है, जो ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी दिखाती है।

पाठ का सार: शुरू से अंत तक

भगत का रूप और वेशभूषा: बालगोबिन भगत लगभग साठ वर्ष के, मंझोले कद के, गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। उनके बाल पक चुके थे। वे कमर में केवल एक लंगोटी पहनते और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी लगाते थे। सर्दियों में काली कमली ओढ़ लेते थे। माथे पर रामानंदी चंदन का टीका और गले में तुलसी की जड़ों की बेडौल माला रहती थी। फिर भी वे संन्यासी नहीं, गृहस्थ थे। उनका एक बेटा, बहू, खेती और साफ-सुथरा मकान था।

कबीर के प्रति श्रद्धा: भगत कबीर को अपना 'साहब' मानते थे। वे कबीर के ही पद गाते, कभी झूठ नहीं बोलते और सबसे खरा व्यवहार रखते थे। किसी की चीज़ को बिना पूछे हाथ नहीं लगाते थे। खेत में जो उपजता, उसे सिर पर लादकर चार कोस दूर कबीरपंथी मठ में ले जाते। वहाँ भेंट चढ़ाकर जो प्रसाद वापस मिलता, उसी से गुजारा करते थे।

संगीत का जादू: आषाढ़ की रिमझिम में जब गाँव धान रोपता, तब भगत का गीत सुनकर बच्चे झूमने लगते, मेढ़ पर बैठी औरतें गुनगुनाने लगतीं और हलवाहों के पैर ताल पर उठने लगते। भादो की अंधेरी रातों में उनकी खँजड़ी डिमिक-डिमिक बजती और वे गाते—'तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफ़िर जाग ज़रा!'

प्रभातियाँ: कार्तिक से फागुन तक वे सुबह अंधेरे में उठकर दो मील दूर नदी-स्नान करने जाते। लौटकर पोखर के ऊँचे भिंडे पर खँजड़ी लेकर प्रभातियाँ गाते। माघ की कड़ी ठंड में भी उनके माथे पर श्रम-बिंदु चमकने लगते। गर्मियों की शाम वे आँगन में 'संझा' गाते और प्रेमी मंडली के साथ उनका गायन नृत्य में बदल जाता।

बेटे की मृत्यु और रूढ़ियों पर प्रहार

भगत का इकलौता बेटा कुछ सुस्त और बोदा था, इसलिए वे उसे और अधिक प्यार करते थे। उसकी मृत्यु पर भगत ने शोक नहीं मनाया। उन्होंने शव को सफेद कपड़े से ढँका, उस पर फूल और तुलसी दल बिखेरे और सामने बैठकर तल्लीनता से गाने लगे। रोती हुई पतोहू से उन्होंने कहा कि यह रोने का नहीं, उत्सव मनाने का समय है, क्योंकि आत्मा परमात्मा के पास चली गई है। उनके लिए मृत्यु विरहिणी आत्मा का अपने प्रियतम परमात्मा से मिलन थी।

क्रिया-कर्म में उन्होंने कोई आडंबर नहीं किया। समाज मानता था कि मुखाग्नि केवल पुरुष दे सकते हैं, पर भगत ने बेटे की चिता को पतोहू से ही आग दिलवाई। श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाकर कहा कि इसकी दूसरी शादी कर देना। पतोहू उनकी सेवा के लिए रुकना चाहती थी, पर भगत ने कहा कि तू जा, नहीं तो मैं ही घर छोड़कर चला जाऊँगा। यह विधवा-विवाह के समर्थन में उनका क्रांतिकारी कदम था।

भगत का अंतिम समय

भगत हर साल गंगा-स्नान और संत-समागम के लिए लगभग तीस कोस पैदल जाते थे। वे घर से खाकर निकलते और घर लौटकर ही खाते। रास्ते में भूख लगने पर भी भोजन नहीं लेते, केवल प्यास लगने पर पानी पीते। भिक्षा या किसी का सहारा न लेना उनके स्वाभिमान को दिखाता है।

अंतिम बार लौटे तो उनकी तबीयत खराब थी। बुखार होने पर भी उन्होंने स्नान, ध्यान और खेती की दिनचर्या नहीं छोड़ी। लोगों ने आराम करने को कहा तो वे हँसकर टाल देते। एक शाम उन्होंने गीत गाए, पर स्वर बिखरे हुए थे। अगली सुबह जब उनका संगीत सुनाई नहीं दिया, तो लोगों ने जाकर देखा कि भगत नहीं रहे, केवल उनका निर्जीव पंजर पड़ा था।

बालगोबिन भगत का चरित्र-चित्रण

  • सच्चे साधु: वेशभूषा से नहीं, बल्कि सच्चाई, खरे व्यवहार और त्याग से वे साधु थे।
  • कबीर के भक्त: कबीर के पद गाते और उनके आदर्शों पर जीवन जीते थे।
  • सत्यवादी और अपरिग्रही: हमेशा सच बोलते, किसी की वस्तु बिना अनुमति नहीं छूते थे।
  • समर्पित: उपज का पहला हिस्सा कबीरपंथी मठ में भेंट करते थे।
  • दृढ़ आस्था वाले: बेटे की मृत्यु पर भी आत्मा-परमात्मा के मिलन में विश्वास रखा।
  • समाज-सुधारक: पतोहू से मुखाग्नि दिलवाई और उसके पुनर्विवाह का समर्थन किया।
  • नियम के पक्के और स्वाभिमानी: बुढ़ापे और बीमारी में भी दिनचर्या नहीं छोड़ी, रास्ते में किसी से भोजन नहीं माँगा।

पाठ का संदेश

पाठ का मुख्य संदेश यह है कि साधु की पहचान पहनावे से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, नैतिकता, परोपकार और सत्य के प्रति निष्ठा से होती है। साधुता का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहकर मोह-माया से मुक्त रहना और सत्य का पालन करना है। भगत ने यह भी दिखाया कि सच्चा प्रेम दूसरे के सुख और भविष्य की चिंता करने में है, उसे अपने स्वार्थ के लिए बांधकर रखने में नहीं।

महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. रामवृक्ष बेनीपुरी को 'कलम का जादूगर' क्यों कहा जाता है? उत्तर: उनकी विशिष्ट, अनूठी और प्रभावशाली लेखन शैली के कारण उन्हें 'कलम का जादूगर' कहा जाता है।

प्रश्न 2. क्या बालगोबिन भगत साधु थे? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। उत्तर: वेशभूषा से भगत साधु जैसे लगते थे, पर वे गृहस्थ थे। लेखक के अनुसार साधु होने का आधार वेशभूषा नहीं, बल्कि मानवीय सरोकार और शुद्ध आचरण है। भगत सच बोलते, खरा व्यवहार करते, किसी की वस्तु बिना पूछे नहीं छूते और उपज का पहला भाग कबीरपंथी मठ में भेंट करते थे। इसलिए वे सच्चे अर्थों में साधु थे।

प्रश्न 3. भगत अपनी उपज कबीरपंथी मठ में क्यों ले जाते थे? उत्तर: वे सब कुछ अपने 'साहब' कबीर का मानते थे। उपज को भेंट चढ़ाना और प्रसाद रूप में लौटे अंश से गुजारा करना उनके त्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक था।

प्रश्न 4. धान की रोपाई के समय भगत के गीतों का वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता था? उत्तर: भगत के मधुर गायन से पूरा वातावरण संगीतमय हो जाता था। बच्चे झूमने लगते, मेढ़ पर बैठी औरतें गुनगुनाने लगतीं और हलवाहों के पैर ताल पर उठने लगते। काम करने वालों में नई ऊर्जा और उत्साह भर जाता था।

प्रश्न 5. प्रभातियाँ क्या होती हैं? भगत इन्हें कब गाते थे? उत्तर: प्रभातियाँ वे गीत हैं जो सुबह सोए हुए लोगों को जगाने के लिए गाए जाते हैं। भगत इन्हें कार्तिक से फागुन तक गाते थे।

प्रश्न 6. बेटे की मृत्यु पर भगत के व्यवहार से उनकी किस सोच का पता चलता है? उत्तर: इससे उनकी आध्यात्मिक सोच का पता चलता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। वे मृत्यु को शोक का नहीं, आत्मा के परमात्मा से मिलन का आनंदमय क्षण मानते थे। इसीलिए वे शव के पास बैठकर गाते रहे और पतोहू से उत्सव मनाने को कहा।

प्रश्न 7. भगत ने अपनी पतोहू को घर से जाने का आदेश क्यों दिया? उत्तर: वे नहीं चाहते थे कि पतोहू अपना बाकी जीवन वैधव्य के दुख में और उनकी सेवा में बिताए। वे उसके सुखद भविष्य और पुनर्विवाह के पक्षधर थे, इसलिए उसके भाई को बुलाकर उसकी दूसरी शादी करने को कहा।

प्रश्न 8. भगत की मृत्यु का पता लोगों को कैसे चला? उत्तर: लोगों को रोज सुबह भगत का संगीत सुनाई देता था। जिस सुबह संगीत सुनाई नहीं दिया, लोगों ने जाकर देखा तो भगत का निर्जीव शरीर पड़ा था।

उत्तर लिखते समय ध्यान रखें

  • बड़े प्रश्न में पहले अपनी बात (दावा) लिखें, फिर पाठ से प्रमाण दें और अंत में व्याख्या करें।
  • भगत को संन्यासी न लिखें; वे गृहस्थ थे जो आचरण से साधु थे।
  • बेटे की मृत्यु पर भगत के व्यवहार को पागलपन न कहें; वह उनका दृढ़ विश्वास था।

पूरा पाठ NCERT की पाठ्यपुस्तक में पढ़ा जा सकता है। इस पाठ को और गहराई से समझने के लिए Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।