02 · समझें
बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व और वेशभूषा
लेखक ने बालगोबिन भगत के बाहरी स्वरूप और उनके आंतरिक गुणों का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है।
बालगोबिन भगत लगभग साठ वर्ष के मंझोले कद के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। उनके बाल पक चुके थे और चेहरा सफेद बालों से जगमगाता रहता था। वे बहुत कम कपड़े पहनते थे—कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी। सर्दियों में वे एक काली कमली (कंबल) ओढ़ लेते थे।
उनके माथे पर हमेशा रामानंदी चंदन का टीका होता था और गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला रहती थी। लेखक स्पष्ट करते हैं कि उनकी इस वेशभूषा का अर्थ यह नहीं था कि वे कोई संन्यासी थे; वे पूर्णतः एक गृहस्थ व्यक्ति थे जिनका एक बेटा, बहू, खेती और साफ-सुथरा मकान था।
भगत का बाह्य स्वरूप
- 1
आयु और कद
60 वर्ष से ऊपर, मंझोला कद, गोरा रंग।
- 2
पहनावा
लंगोटी, कनफटी टोपी और सर्दियों में काली कमली।
- 3
धार्मिक चिह्न
रामानंदी चंदन और तुलसी की माला।
बालगोबिन भगत की वेशभूषा उनके कबीरपंथी विचारों और सरल जीवन को दर्शाती है।
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प्रश्न
क्या बालगोबिन भगत एक साधु थे? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
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03 · समझें
कबीर के प्रति अगाध श्रद्धा
बालगोबिन भगत कबीर को अपना 'साहब' मानते थे और उन्हीं के आदर्शों पर अपना जीवन व्यतीत करते थे।
भगत कबीर के ही पदों को गाते और उनके बताए मार्ग पर चलते थे। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सभी के साथ खरा व्यवहार रखते थे। वे किसी की चीज़ को बिना पूछे हाथ नहीं लगाते थे, यहाँ तक कि दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते थे।
उनकी श्रद्धा की पराकाष्ठा यह थी कि उनके खेत में जो कुछ भी पैदा होता, उसे वे सबसे पहले अपने सिर पर लादकर चार कोस दूर कबीरपंथी मठ में ले जाते थे। वहाँ उसे 'भेंट' के रूप में अर्पित करने के बाद जो 'प्रसाद' रूप में वापस मिलता, उसी से वे अपना गुजारा करते थे।
| आचरण | विवरण |
|---|---|
| सत्यवादिता | हमेशा सच बोलना और स्पष्ट व्यवहार रखना। |
| अपरिग्रह | किसी की वस्तु को बिना अनुमति के प्रयोग न करना। |
| समर्पण | उपज का पहला हिस्सा कबीरपंथी मठ में दान करना। |
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प्रश्न
भगत अपनी उपज को मठ में क्यों दे आते थे?
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04 · समझें
संगीत का जादू: आषाढ़ और भादो
भगत का संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ईश्वर की भक्ति में डूबी एक साधना थी जो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
आषाढ़ की रिमझिम बारिश में जब पूरा गाँव खेतों में धान की रोपाई कर रहा होता, तब भगत का कंठ संगीत की लहरें बिखेरता था। उनके गीतों के प्रभाव से बच्चे झूमने लगते, मेढ़ पर बैठी औरतों के होंठ गुनगुनाने लगते और हलवाहों के पैर ताल पर उठने लगते थे।
भादो की अंधेरी रातों में, जब सारा संसार सोया होता, भगत की खँजड़ी 'डिमिक-डिमिक' बजती और वे गाते—'तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफ़िर जाग ज़रा!' उनका संगीत अंधेरे में बिजली की कौंध की तरह सबको चौंका देता था।
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प्रश्न
धान की रोपाई के समय वातावरण कैसा हो जाता था?
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05 · समझें
ऋतुचर्या और प्रभातियाँ
बालगोबिन भगत की दिनचर्या नियमों से बंधी थी, जिसे उन्होंने वृद्धावस्था में भी नहीं छोड़ा।
कार्तिक मास आते ही उनकी 'प्रभातियाँ' (सुबह के गीत) शुरू हो जाती थीं, जो फागुन तक चलती थीं। वे सुबह अंधेरे में उठकर गाँव से दो मील दूर नदी स्नान के लिए जाते थे। वहाँ से लौटकर वे पोखर के ऊँचे भिंडे पर अपनी खँजड़ी लेकर बैठ जाते और गीत गाते थे।
लेखक बताते हैं कि माघ की कँपकँपाती ठंड में भी भगत के माथे पर श्रम-बिंदु (पसीने की बूंदें) चमकने लगते थे। गर्मियों की उमस भरी शाम में वे अपने आँगन में 'संझा' गाते थे, जहाँ उनके प्रेमी मंडली के साथ उनका संगीत धीरे-धीरे नृत्य में बदल जाता था। उनका तन और मन भक्ति के उल्लास में नाच उठता था।
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प्रश्न
प्रभातियाँ क्या होती हैं?
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