Class 10 · Hindi · Chapter 9 · NCERT Class 10 Hindi – Kshitij Bhag 2

लखनवी अंदाज़ कक्षा 10 नोट्स

मुफ़्त: पूरा माइंड मैप और अध्याय के पहले 4 भाग। बाकी 3 भाग मुफ़्त अकाउंट से।

माइंड मैप

पूरे अध्याय की मुख्य बातें एक नज़र में।

लखनवी अंदाज़

यशपाल द्वारा रचित यह पाठ पतनशील सामंती वर्ग की बनावटी जीवन शैली और बिना कथ्य की 'नई कहानी' के लेखन पर एक तीखा कटाक्ष है।

  1. लेखक और उद्देश्य

    यशपाल एक यथार्थवादी रचनाकार हैं जो सामाजिक पाखंड के विरुद्ध लिखते हैं।

    • यशपाल का परिचय — 1903 में जन्मे यशपाल क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े थे और आम आदमी के सरोकारों को प्रमुखता देते थे।
    • व्यंग्य का लक्ष्य — यह साबित करना कि बिना कथ्य (कहानी का आधार) के सार्थक कहानी नहीं लिखी जा सकती।
  2. ट्रेन की यात्रा

    लेखक ने एकांत चिंतन और नई कहानी की खोज में सेकंड क्लास का टिकट लिया था।

    • नवाब साहब से भेंट — डिब्बे में लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सज्जन पालथी मारकर बैठे थे, जिनके सामने दो ताज़े खीरे थे।
    • असंतोष का भाव — लेखक के आने से नवाब साहब के एकांत चिंतन में बाधा पड़ी, जिससे उनके चेहरे पर असंतोष दिखा।
  3. दिखावा और व्यवहार

    नवाब साहब का व्यवहार उनके आंतरिक विरोधाभास और बनावटी रईसी को उजागर करता है।

    • अचानक भाव-परिवर्तन — शुरुआत में उपेक्षा करने के बाद अचानक 'आदाब-अर्ज़' कहकर खीरे का शौक फरमाने का निमंत्रण देना।
    • नवाबी नफ़ासत — खीरे को धोना, छीलना, काटना और कड़वाहट निकालने के लिए झाग निकालना उनकी विशिष्ट शैली थी।
  4. खीरे का रसास्वादन

    नवाब साहब ने खीरे को खाने के बजाय केवल सूंघकर अपनी तृप्ति का प्रदर्शन किया।

    • अजीब प्रक्रिया — फाँक को होंठों तक ले जाना, सूंघना और फिर खिड़की से बाहर फेंक देना।
    • काल्पनिक तृप्ति — बिना खाए केवल सुगंध से पेट भरने का ढोंग करना और ज़ोरदार डकार लेना।
  5. सामंती मानसिकता

    लेखक ने इस वर्ग को 'परजीवी संस्कृति' कहा है जो वास्तविकता से दूर है।

    • दिखावटी जीवन — अपनी असलियत छिपाकर दूसरों पर प्रभाव डालने के लिए किया गया खोखला प्रदर्शन।
    • नज़ाकत और पाखंड — खीरे जैसी साधारण वस्तु को 'अपदार्थ' समझना और उसे खाने में संकोच करना।
  6. साहित्यिक निष्कर्ष

    नवाब साहब की डकार ने लेखक को कहानी लेखन के नए दृष्टिकोण की ओर प्रेरित किया।

    • ज्ञान-चक्षु खुलना — यदि सुगंध से पेट भर सकता है, तो बिना विचार, घटना या पात्र के कहानी भी बन सकती है।
    • सार्थक सृजन — लेखक का मानना है कि बिना किसी ठोस उद्देश्य या कथ्य के सार्थक साहित्य संभव नहीं है।

अध्याय के नोट्स

यशपाल द्वारा रचित यह व्यंग्य 'लखनवी अंदाज़' पतनशील सामंती वर्ग की बनावटी जीवन शैली पर कटाक्ष करता है। लेखक ने इस रचना के माध्यम से 'नई कहानी' के उस दावे पर भी व्यंग्य किया है कि बिना किसी ठोस विचार, घटना या पात्र के भी कहानी लिखी जा सकती है; वे दिखाते हैं कि बिना कथ्य के कहानी नहीं बन सकती।

लेखक परिचय: यशपाल

यशपाल हिंदी साहित्य के एक प्रमुख यथार्थवादी रचनाकार हैं, जिनका जन्म 1903 में हुआ था।

यशपाल का जन्म पंजाब के फ़िरोज़पुर छावनी में हुआ था। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उनका परिचय महान क्रांतिकारियों भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

उनकी रचनाओं में आम आदमी के सरोकारों की प्रमुखता है। वे सामाजिक विषमता, राजनीतिक पाखंड और रूढ़ियों के विरुद्ध अपनी लेखनी चलाते थे। उनका उपन्यास 'झूठा सच' भारत विभाजन की त्रासदी का एक मार्मिक दस्तावेज़ माना जाता है।

यशपाल की भाषा अत्यंत स्वाभाविक और सजीव है। उन्होंने 'लखनवी अंदाज़' व्यंग्य यह साबित करने के लिए लिखा था कि बिना कथ्य (कहानी का आधार) के कहानी नहीं लिखी जा सकती, परंतु इसे एक स्वतंत्र रचना के रूप में भी सराहा जाता है।

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NCERT reference: chapter PDF page 1.

ट्रेन की यात्रा और नवाब साहब से भेंट

लेखक ने एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लिया था।

लेखक को पास ही कहीं जाना था, इसलिए उन्होंने भीड़ से बचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखते हुए नई कहानी के विषय में सोचने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लिया। जब वे डिब्बे में चढ़े, तो उन्होंने देखा कि वहाँ पहले से ही एक 'सफ़ेदपोश' (भद्र व्यक्ति) सज्जन बैठे थे।

वे सज्जन लखनऊ की नवाबी नस्ल के लग रहे थे और बहुत सुविधा से पालथी मारकर बैठे थे। उनके सामने तौलिए पर दो ताज़े-चिकने खीरे रखे थे। लेखक के अचानक आ जाने से उन सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में बाधा पड़ने का असंतोष दिखाई दिया।

लेखक ने महसूस किया कि शायद नवाब साहब ने अकेले यात्रा करने और किफायत (बचत) के विचार से सेकंड क्लास का टिकट लिया होगा और अब उन्हें किसी सफ़ेदपोश (भद्र व्यक्ति) के सामने खीरा जैसी 'अपदार्थ' यानी तुच्छ समझी जाने वाली वस्तु खाते हुए संकोच हो रहा था।

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लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट क्यों खरीदा था?

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NCERT reference: chapter PDF page 2.

नवाब साहब का व्यवहार और दिखावा

नवाब साहब ने शुरुआत में लेखक से बात करने में कोई रुचि नहीं दिखाई, लेकिन अचानक उनका व्यवहार बदल गया।

शुरुआत में नवाब साहब ने लेखक के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाया, जिससे लेखक ने भी अपने आत्मसम्मान में उनसे आँखें चुरा लीं। लेखक खाली बैठे नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारणों का अनुमान लगाने लगे।

अचानक नवाब साहब ने लेखक को संबोधित करते हुए कहा, 'आदाब-अर्ज़, जनाब, खीरे का शौक़ फ़रमाएंगे?' लेखक को उनका यह अचानक भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। लेखक ने सोचा कि नवाब साहब अपनी शराफ़त का भ्रम बनाए रखने के लिए उन्हें भी मामूली लोगों की हरकत में लपेटना चाहते हैं।

लेखक ने शुक्रिया अदा करते हुए मना कर दिया। इसके बाद नवाब साहब ने बहुत ही करीने (तरीके) से खीरों को धोया, पोंछा और उनके सिर काटकर झाग निकाला ताकि उनकी कड़वाहट निकल जाए। यह पूरी प्रक्रिया उनकी नवाबी शान को दर्शा रही थी।

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नवाब साहब ने खीरे के सिर काटकर झाग क्यों निकाला?

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NCERT reference: chapter PDF pages 2, 3.

खीरे की तैयारी और रसास्वादन

नवाब साहब ने खीरे को खाने के बजाय केवल सूंघकर अपनी तृप्ति का प्रदर्शन किया।

नवाब साहब ने खीरे को छीलकर उसकी फाँकों को बहुत करीने से तौलिए पर सजाया। उन्होंने उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी (लाल पाउडर) छिड़क दी। लेखक देख रहे थे कि इस प्रक्रिया के दौरान नवाब साहब के मुँह में पानी आ रहा था।

नवाब साहब ने एक बार फिर लेखक से पूछा, लेकिन लेखक पहले ही मना कर चुके थे, इसलिए उन्होंने अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने के लिए दोबारा मना कर दिया। लेखक ने बहाना बनाया कि उनका 'मेदा' (अमाशय) कमज़ोर है।

इसके बाद जो हुआ वह अत्यंत विचित्र था। नवाब साहब ने खीरे की एक-एक फाँक उठाई, उसे होंठों तक ले गए, उसे सूंघा और स्वाद के आनंद में अपनी पलकें मूँद लीं। मुँह में आए पानी के घूँट को गले से उतारकर उन्होंने फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया।

नवाब साहब द्वारा खीरा त्यागने का क्रम

  1. 1

    तैयारी

    खीरे को धोना, छीलना और नमक-मिर्च छिड़कना।

  2. 2

    सूंघना

    फाँक को नाक के पास ले जाकर उसकी सुगंध का आनंद लेना।

  3. 3

    त्याग

    बिना खाए फाँक को खिड़की से बाहर फेंक देना।

  4. 4

    तृप्ति का प्रदर्शन

    हाथ-मुँह पोंछकर गर्व से लेखक की ओर देखना।

यह प्रक्रिया नवाब साहब की बनावटी जीवन शैली और खानदानी रईसी के दिखावे को दर्शाती है।

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नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर क्यों फेंक दिया?

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NCERT reference: chapter PDF pages 3, 4.

आगे का अध्याय

लखनवी अंदाज़ — बाकी अध्याय मुफ़्त में पढ़ें

  1. Locked: 1. सामंती वर्ग पर व्यंग्य
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