02 · समझें
ट्रेन की यात्रा और नवाब साहब से भेंट
लेखक ने एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लिया था।
लेखक को पास ही कहीं जाना था, इसलिए उन्होंने भीड़ से बचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखते हुए नई कहानी के विषय में सोचने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लिया। जब वे डिब्बे में चढ़े, तो उन्होंने देखा कि वहाँ पहले से ही एक 'सफ़ेदपोश' (भद्र व्यक्ति) सज्जन बैठे थे।
वे सज्जन लखनऊ की नवाबी नस्ल के लग रहे थे और बहुत सुविधा से पालथी मारकर बैठे थे। उनके सामने तौलिए पर दो ताज़े-चिकने खीरे रखे थे। लेखक के अचानक आ जाने से उन सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में बाधा पड़ने का असंतोष दिखाई दिया।
लेखक ने महसूस किया कि शायद नवाब साहब ने अकेले यात्रा करने और किफायत (बचत) के विचार से सेकंड क्लास का टिकट लिया होगा और अब उन्हें किसी सफ़ेदपोश (भद्र व्यक्ति) के सामने खीरा जैसी 'अपदार्थ' यानी तुच्छ समझी जाने वाली वस्तु खाते हुए संकोच हो रहा था।
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प्रश्न
लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट क्यों खरीदा था?
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03 · समझें
नवाब साहब का व्यवहार और दिखावा
नवाब साहब ने शुरुआत में लेखक से बात करने में कोई रुचि नहीं दिखाई, लेकिन अचानक उनका व्यवहार बदल गया।
शुरुआत में नवाब साहब ने लेखक के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाया, जिससे लेखक ने भी अपने आत्मसम्मान में उनसे आँखें चुरा लीं। लेखक खाली बैठे नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारणों का अनुमान लगाने लगे।
अचानक नवाब साहब ने लेखक को संबोधित करते हुए कहा, 'आदाब-अर्ज़, जनाब, खीरे का शौक़ फ़रमाएंगे?' लेखक को उनका यह अचानक भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। लेखक ने सोचा कि नवाब साहब अपनी शराफ़त का भ्रम बनाए रखने के लिए उन्हें भी मामूली लोगों की हरकत में लपेटना चाहते हैं।
लेखक ने शुक्रिया अदा करते हुए मना कर दिया। इसके बाद नवाब साहब ने बहुत ही करीने (तरीके) से खीरों को धोया, पोंछा और उनके सिर काटकर झाग निकाला ताकि उनकी कड़वाहट निकल जाए। यह पूरी प्रक्रिया उनकी नवाबी शान को दर्शा रही थी।
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प्रश्न
नवाब साहब ने खीरे के सिर काटकर झाग क्यों निकाला?
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04 · समझें
खीरे की तैयारी और रसास्वादन
नवाब साहब ने खीरे को खाने के बजाय केवल सूंघकर अपनी तृप्ति का प्रदर्शन किया।
नवाब साहब ने खीरे को छीलकर उसकी फाँकों को बहुत करीने से तौलिए पर सजाया। उन्होंने उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी (लाल पाउडर) छिड़क दी। लेखक देख रहे थे कि इस प्रक्रिया के दौरान नवाब साहब के मुँह में पानी आ रहा था।
नवाब साहब ने एक बार फिर लेखक से पूछा, लेकिन लेखक पहले ही मना कर चुके थे, इसलिए उन्होंने अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने के लिए दोबारा मना कर दिया। लेखक ने बहाना बनाया कि उनका 'मेदा' (अमाशय) कमज़ोर है।
इसके बाद जो हुआ वह अत्यंत विचित्र था। नवाब साहब ने खीरे की एक-एक फाँक उठाई, उसे होंठों तक ले गए, उसे सूंघा और स्वाद के आनंद में अपनी पलकें मूँद लीं। मुँह में आए पानी के घूँट को गले से उतारकर उन्होंने फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया।
नवाब साहब द्वारा खीरा त्यागने का क्रम
- 1
तैयारी
खीरे को धोना, छीलना और नमक-मिर्च छिड़कना।
- 2
सूंघना
फाँक को नाक के पास ले जाकर उसकी सुगंध का आनंद लेना।
- 3
त्याग
बिना खाए फाँक को खिड़की से बाहर फेंक देना।
- 4
तृप्ति का प्रदर्शन
हाथ-मुँह पोंछकर गर्व से लेखक की ओर देखना।
यह प्रक्रिया नवाब साहब की बनावटी जीवन शैली और खानदानी रईसी के दिखावे को दर्शाती है।
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प्रश्न
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर क्यों फेंक दिया?
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