01 · समझें
लेखिका परिचय: मन्नू भंडारी
मन्नू भंडारी हिंदी साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिनका जन्म 1931 में मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था।
मन्नू भंडारी की प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के अजमेर शहर में हुई। उन्होंने हिंदी में एम.ए. किया और दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'एक प्लेट सैलाब', 'मैं हार गई', 'यही सच है' (कहानी-संग्रह) और 'आपका बंटी', 'महाभोज' (उपन्यास) शामिल हैं।
यह पाठ 'एक कहानी यह भी' उनकी कोई पारंपरिक आत्मकथा नहीं है, बल्कि एक 'आत्मकथ्य' है। इसमें उन्होंने उन लोगों और प्रसंगों का वर्णन किया है जिन्होंने उनके लेखन जीवन को प्रभावित किया। विशेष रूप से उनके पिता और उनकी कॉलेज की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का उनके व्यक्तित्व निर्माण में बड़ा योगदान रहा है।
रुकें और सोचें
पहले खुद सोचें। अपना उत्तर लिखने और जाँचने के लिए मुफ़्त अकाउंट चाहिए।
प्रश्न
मन्नू भंडारी ने इस पाठ को 'आत्मकथा' के बजाय 'आत्मकथ्य' क्यों कहा है?
उत्तर देखने के लिए लॉग इन करें
अपना उत्तर लिखें और हमारे उत्तर से मिलाएँ — मुफ़्त।
लॉग इन करेंनए हैं? मुफ़्त अकाउंट बनाएँNCERT reference: chapter PDF pages 1, 2.
02 · समझें
पिता का व्यक्तित्व और अंतर्द्वंद्व
लेखिका के जीवन पर उनके पिता के व्यक्तित्व की गहरी और विरोधाभासी छाप रही है।
अजमेर आने से पहले लेखिका के पिता इंदौर में थे, जहाँ उनका बहुत सम्मान था। वे केवल शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक भी थे। वे बेहद कोमल और संवेदनशील होने के साथ-साथ अत्यंत क्रोधी और अहंवादी (अहंकारी) भी थे। एक बड़े आर्थिक झटके के कारण वे इंदौर से अजमेर आ गए, जहाँ उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती गई। उन्होंने विषयवार अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश पर भी काम किया था।
आर्थिक तंगी और अपनों के विश्वासघात ने उन्हें शक्की (संदेह करने वाला) बना दिया था। वे अपनी असफलताओं का गुस्सा अक्सर लेखिका की माँ पर निकालते थे। लेखिका बताती हैं कि उनके पिता के भीतर 'विशिष्ट' बनने की चाह थी, लेकिन सामाजिक छवि के प्रति वे बहुत सजग थे। ये दो परस्पर विरोधी बातें अक्सर उनके जीवन में टकराव पैदा करती थीं।
रुकें और सोचें
पहले खुद सोचें। अपना उत्तर लिखने और जाँचने के लिए मुफ़्त अकाउंट चाहिए।
प्रश्न
लेखिका के पिता के व्यक्तित्व में कौन से दो परस्पर विरोधी गुण थे?
उत्तर देखने के लिए लॉग इन करें
अपना उत्तर लिखें और हमारे उत्तर से मिलाएँ — मुफ़्त।
लॉग इन करेंनए हैं? मुफ़्त अकाउंट बनाएँNCERT reference: chapter PDF pages 3, 4, 9.
03 · समझें
बचपन और हीन-भावना की ग्रंथि
लेखिका के मन में बचपन से ही एक गहरी हीन-भावना (Inferiority Complex) बैठ गई थी, जिसका कारण उनके पिता का व्यवहार था।
लेखिका का रंग काला था और वे बचपन में दुबली-पतली थीं। उनके पिता को गोरा रंग बहुत पसंद था। वे लेखिका की तुलना उनकी दो साल बड़ी बहन सुशीला से करते थे, जो बहुत गोरी और स्वस्थ थी। पिता द्वारा बार-बार की जाने वाली इस तुलना और सुशीला की प्रशंसा ने लेखिका के मन में हीन-भावना पैदा कर दी।
लेखिका स्वीकार करती हैं कि आज भी, जब उन्हें बड़ी उपलब्धियाँ और सम्मान मिलता है, तो वे उन पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर पातीं। उन्हें लगता है कि यह सब केवल एक 'तुक्का' है। बचपन की वह हीन-भावना आज भी उनके अचेतन मन में कहीं न कहीं दबी हुई है।
रुकें और सोचें
पहले खुद सोचें। अपना उत्तर लिखने और जाँचने के लिए मुफ़्त अकाउंट चाहिए।
प्रश्न
लेखिका के भीतर हीन-भावना पैदा होने का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर देखने के लिए लॉग इन करें
अपना उत्तर लिखें और हमारे उत्तर से मिलाएँ — मुफ़्त।
लॉग इन करेंनए हैं? मुफ़्त अकाउंट बनाएँNCERT reference: chapter PDF pages 4, 5.
04 · समझें
माँ का व्यक्तित्व: धैर्य और सहनशीलता
लेखिका की माँ उनके पिता के बिल्कुल विपरीत स्वभाव की थीं।
माँ पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनमें धरती से भी अधिक धैर्य और सहनशीलता थी। वे पिता की हर ज्यादती (अन्याय) को अपना भाग्य और बच्चों की हर उचित-अनुचित माँग को अपना फर्ज समझकर स्वीकार करती थीं। उन्होंने जीवन भर केवल दूसरों को दिया, अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा।
लेखिका और उनके भाई-बहनों का लगाव माँ के साथ अधिक था क्योंकि वे उनके प्रति सहानुभूति रखती थीं। हालांकि, लेखिका माँ के इस 'असहाय त्याग' और 'सहनशीलता' को अपना आदर्श नहीं मान सकीं। उन्हें माँ का यह समर्पण मजबूरी का परिणाम लगता था, न कि स्वेच्छा का।
रुकें और सोचें
पहले खुद सोचें। अपना उत्तर लिखने और जाँचने के लिए मुफ़्त अकाउंट चाहिए।
प्रश्न
लेखिका अपनी माँ के त्याग को अपना आदर्श क्यों नहीं बना सकीं?
उत्तर देखने के लिए लॉग इन करें
अपना उत्तर लिखें और हमारे उत्तर से मिलाएँ — मुफ़्त।
लॉग इन करेंनए हैं? मुफ़्त अकाउंट बनाएँNCERT reference: chapter PDF pages 3, 4.
05 · समझें
रसोई बनाम 'भटियारखाना'
लेखिका के घर में वैचारिक माहौल था, जहाँ राजनीति पर खूब चर्चाएँ होती थीं।
लेखिका के पिता चाहते थे कि उनकी बेटियाँ केवल घर के कामों तक सीमित न रहें। वे रसोई को 'भटियारखाना' कहते थे। उनके अनुसार रसोई में रहने का अर्थ था अपनी प्रतिभा और क्षमता को भट्टी में झोंक देना। वे चाहते थे कि लेखिका देश की परिस्थितियों को समझें।
घर में अक्सर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के लोग आते थे और बहसें होती थीं। पिता लेखिका को भी उन बहसों में बैठने के लिए प्रोत्साहित करते थे। हालांकि उस समय लेखिका को राजनीति की गहरी समझ नहीं थी, लेकिन क्रांतिकारियों और शहीदों की कहानियाँ उन्हें बहुत प्रभावित करती थीं।
रुकें और सोचें
पहले खुद सोचें। अपना उत्तर लिखने और जाँचने के लिए मुफ़्त अकाउंट चाहिए।
प्रश्न
लेखिका के पिता रसोई को 'भटियारखाना' क्यों कहते थे?
उत्तर देखने के लिए लॉग इन करें
अपना उत्तर लिखें और हमारे उत्तर से मिलाएँ — मुफ़्त।
लॉग इन करेंनए हैं? मुफ़्त अकाउंट बनाएँNCERT reference: chapter PDF pages 5, 6.
