01 · समझें
बिस्मिल्ला खाँ: शहनाई के नायक
यतींद्र मिश्र द्वारा रचित यह पाठ उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व और उनकी संगीत के प्रति अटूट श्रद्धा का परिचय देता है।
बिस्मिल्ला खाँ का असली नाम अमीरुद्दीन था। उनका जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के ही निवासी थे। उनके पिता पैगंबर बख्श खाँ और माँ मिट्ठन के वे छोटे साहबजादे थे।
डुमराँव का महत्व शहनाई की दुनिया में इसलिए है क्योंकि शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट) का प्रयोग होता है, वह मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। अमीरुद्दीन पाँच-छह वर्ष की आयु में अपने ननिहाल काशी आ गए थे।
लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ को 'शहनाई की मंगलध्वनि का नायक' कहा है क्योंकि उन्होंने अस्सी वर्षों तक अपनी शहनाई के माध्यम से सुरों की साधना की और इसे विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया।
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शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?
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02 · समझें
बचपन और संगीत की प्रेरणा
अमीरुद्दीन के बचपन के अनुभव और उनकी संगीत के प्रति शुरुआती रुचि का वर्णन यहाँ किया गया है।
अमीरुद्दीन जब चौदह साल के थे, तब वे काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने में रियाज़ करने जाते थे। मंदिर जाने का उनका रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर के पास से होकर गुजरता था।
इन गायिका बहनों के यहाँ से उठने वाली ठुमरी, टप्पे और दादरा की आवाज़ों ने अमीरुद्दीन के मन में संगीत के प्रति आकर्षण पैदा किया। खाँ साहब ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनके जीवन के शुरुआती दिनों में संगीत की प्रेरणा इन्हीं बहनों से मिली थी।
बचपन में वे अपने नाना को छुपकर शहनाई बजाते सुनते थे और बाद में उनकी मीठी शहनाई ढूँढने के लिए कई शहनाइयाँ फेंक देते थे। उन्हें 'सम' पर आने की तमीज़ बचपन में ही मिल गई थी, हालाँकि तब वे प्रशंसा के लिए ज़मीन पर पत्थर पटककर दाद देते थे।
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प्रश्न
अमीरुद्दीन को संगीत की प्रारंभिक प्रेरणा किससे मिली?
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03 · समझें
शहनाई: सुषिर वाद्यों में शाह
संगीत शास्त्र के अनुसार शहनाई की स्थिति और इसके ऐतिहासिक संदर्भों को समझना आवश्यक है।
शहनाई को 'सुषिर वाद्यों' की श्रेणी में रखा जाता है। सुषिर वाद्य वे होते हैं जिन्हें फूँककर बजाया जाता है। अरब देशों में ऐसे वाद्यों को 'नय' कहा जाता है।
पाठ में शहनाई को सुषिर वाद्यों में शाह कहा गया है। यह उसकी मांगलिक और मधुर ध्वनि के प्रति सम्मान का रूप है, कोई वैज्ञानिक श्रेष्ठता-क्रम नहीं। लेखक सोलहवीं शताब्दी के तानसेन की बंदिशों में इसके उल्लेख का संदर्भ भी देते हैं।
दक्षिण भारत के 'नागस्वरम्' की तरह शहनाई भी प्रभाती की मंगलध्वनि का पूरक है। इसे अक्सर मांगलिक कार्यों और उत्सवों के अवसर पर बजाया जाता है।
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प्रश्न
शहनाई को 'सुषिर वाद्यों में शाह' क्यों कहा गया है?
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04 · समझें
मुहर्रम और शोक की परंपरा
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मानवीय संवेदना और शोक की गहरी भावना थी।
मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति शोक (अज़ादारी) मनाते हैं। बिस्मिल्ला खाँ का खानदान इन दस दिनों में न तो शहनाई बजाता था और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में शामिल होता था।
आठवीं तारीख उनके लिए विशेष थी। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए 'नौहा' (शोक गीत) बजाते जाते थे।
इस दिन कोई राग नहीं बजाया जाता था। उनकी आँखें इमाम हुसैन की शहादत की याद में नम रहती थीं। यह उनके व्यक्तित्व के उस मानवीय पक्ष को दर्शाता है जहाँ कला और धर्म एक साथ विलीन हो जाते हैं।
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प्रश्न
मुहर्रम के दिनों में बिस्मिल्ला खाँ की दिनचर्या क्या होती थी?
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05 · समझें
काशी और गंगा-जमुनी संस्कृति
बिस्मिल्ला खाँ काशी की मिली-जुली संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक थे।
खाँ साहब के लिए काशी और शहनाई से बढ़कर इस धरती पर कोई जन्नत नहीं थी। वे अक्सर कहते थे कि वे काशी छोड़कर कहीं नहीं जा सकते क्योंकि यहाँ गंगा मैया, बाबा विश्वनाथ और बालाजी का मंदिर है।
वे जब भी काशी से बाहर होते थे, तो विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते थे और अपनी शहनाई का प्याला उसी ओर घुमा देते थे। उनकी आस्था उनकी 'रीड' के माध्यम से बजती थी।
काशी में संगीत, भक्ति और धर्म को अलग करके नहीं देखा जा सकता। यहाँ बिस्मिल्ला खाँ को गंगाद्वार से और विश्वनाथ को विशालाक्षी से अलग करना असंभव है। यह काशी की विशिष्ट 'तहज़ीब' (संस्कृति) है।
सांस्कृतिक समन्वय का प्रवाह
- 1
धार्मिक आस्था
मुस्लिम होते हुए भी बाबा विश्वनाथ और बालाजी के प्रति अटूट श्रद्धा।
- 2
कला साधना
शहनाई को खुदा की इबादत और सुर की प्रार्थना मानना।
- 3
सांस्कृतिक एकता
काशी की गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत उदाहरण बनना।
बिस्मिल्ला खाँ का जीवन धर्म और कला के सुंदर मेल को दर्शाता है।
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प्रश्न
बिस्मिल्ला खाँ काशी के बाहर होने पर अपनी श्रद्धा कैसे प्रकट करते थे?
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