7 October 20267 min readBy Learnijoy Team

एक कहानी यह भी कक्षा 10: क्षितिज अध्याय 10 सार और प्रश्न-उत्तर

मन्नू भंडारी के आत्मकथ्य का पूरा सार, पिता, माँ और शीला अग्रवाल का प्रभाव, पाठ का संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।

कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग 2 का अध्याय 10 "एक कहानी यह भी" (Ek Kahani Yah Bhi) मन्नू भंडारी का आत्मकथ्य है। इस लेख में आप पाठ का शुरू से अंत तक सार, पिता, माँ और शीला अग्रवाल का लेखिका पर प्रभाव, पाठ का संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे। यह पाठ लेखिका के बचपन, पिता के साथ उनके उलझे हुए संबंधों और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी को दिखाता है।

लेखिका परिचय: मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी का जन्म 1931 में मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के अजमेर शहर में हुई। उन्होंने हिंदी में एम.ए. किया और दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में पढ़ाया। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं— 'एक प्लेट सैलाब', 'मैं हार गई', 'यही सच है' (कहानी-संग्रह) तथा 'आपका बंटी' और 'महाभोज' (उपन्यास)।

आत्मकथा नहीं, आत्मकथ्य: इस पाठ में लेखिका ने अपने जीवन का सिलसिलेवार इतिहास नहीं लिखा। उन्होंने केवल उन व्यक्तियों और घटनाओं का वर्णन किया है जिन्होंने उनके लेखकीय व्यक्तित्व को आकार दिया। इसलिए यह आत्मकथ्य है।

पाठ का सार: पिता और बचपन

पिता का व्यक्तित्व: अजमेर आने से पहले लेखिका के पिता इंदौर में थे, जहाँ उनका बहुत सम्मान था। वे शिक्षाविद होने के साथ समाज सुधारक भी थे और उन्होंने विषयवार अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश पर काम किया था। एक बड़े आर्थिक झटके के कारण वे अजमेर आ गए, जहाँ उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती गई। आर्थिक तंगी और अपनों के विश्वासघात ने उन्हें शक्की बना दिया। वे कोमल और संवेदनशील भी थे, और क्रोधी व अहंवादी भी। अपनी असफलताओं का गुस्सा वे अक्सर लेखिका की माँ पर निकालते थे।

हीन-भावना की ग्रंथि: लेखिका का रंग काला था और वे बचपन में दुबली-पतली थीं। पिता को गोरा रंग पसंद था। वे लेखिका की तुलना उनसे दो साल बड़ी बहन सुशीला से करते, जो गोरी और स्वस्थ थी, और सुशीला की ही प्रशंसा करते। इससे लेखिका के मन में हीन-भावना बैठ गई। आज भी बड़ी उपलब्धि या सम्मान मिलने पर वे उस पर पूरा विश्वास नहीं कर पातीं और उन्हें लगता है कि यह केवल 'तुक्का' है।

माँ, रसोई और घर का माहौल

माँ का स्वभाव: माँ पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर उनमें धरती से भी अधिक धैर्य और सहनशीलता थी। वे पिता की हर ज्यादती को अपना भाग्य और बच्चों की हर उचित-अनुचित माँग को अपना फर्ज मानती थीं। उन्होंने जीवन भर दूसरों को दिया, अपने लिए कुछ नहीं माँगा। बच्चों का लगाव माँ से अधिक था, पर लेखिका माँ के इस असहाय त्याग को अपना आदर्श नहीं बना सकीं, क्योंकि उन्हें यह मजबूरी लगता था, स्वेच्छा नहीं।

रसोई या 'भटियारखाना': पिता चाहते थे कि बेटियाँ केवल घर के कामों तक सीमित न रहें। वे रसोई को 'भटियारखाना' कहते थे, यानी ऐसी जगह जहाँ प्रतिभा और क्षमता भट्टी में झोंक दी जाती है। घर में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के लोग आते और बहसें होतीं। पिता लेखिका को इन बहसों में बैठने के लिए प्रोत्साहित करते थे, ताकि वे देश की परिस्थितियाँ समझें। तब राजनीति की गहरी समझ न होने पर भी क्रांतिकारियों और शहीदों की कहानियाँ उन्हें बहुत प्रभावित करती थीं।

शीला अग्रवाल और स्वतंत्रता आंदोलन

1945 में दसवीं पास करके कॉलेज में आने पर लेखिका की मुलाकात हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से हुई। शीला जी ने उन्हें चुन-चुनकर किताबें दीं और उन पर लंबी बहसें कीं। उनके प्रभाव से लेखिका ने जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल और भगवतीचरण वर्मा को पढ़ना शुरू किया। शीला जी ने उन्हें घर की चारदीवारी से निकालकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने की प्रेरणा दी।

1946-47 में लेखिका प्रभात-फेरियाँ निकालने, हड़तालें करवाने और भाषण देने लगीं। छोटे शहर की लड़की का सड़कों पर लड़कों के साथ नारे लगाना पिता को पसंद नहीं था। यहीं से पिता-पुत्री का वैचारिक टकराव शुरू हुआ: पिता चाहते थे कि बेटी 'विशिष्ट' बने, पर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर डरते भी थे। कॉलेज से शिकायत आने पर वे पहले बहुत गुस्सा हुए, पर जब पता चला कि पूरा कॉलेज लेखिका के एक इशारे पर खाली हो जाता है, तो उनका गुस्सा गर्व में बदल गया।

आंदोलन का चरम और आज़ादी

घटनासमयपरिणाम
शीला अग्रवाल को नोटिसमई 1947लड़कियों को भड़काने और अनुशासन बिगाड़ने का आरोप
थर्ड ईयर बंद; लेखिका सहित दो-तीन छात्राओं का प्रवेश रोकाजुलाई 1947कॉलेज के बाहर विरोध जारी
थर्ड ईयर फिर खुलाअगस्त 1947छात्राओं की जीत
देश स्वतंत्र हुआ15 अगस्त 1947लेखिका के लिए शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि

पात्रों का चरित्र और पाठ का संदेश

  • पिता: कोमल-संवेदनशील पर क्रोधी, अहंवादी और शक्की; बेटी को विशिष्ट बनाना चाहते थे, पर सामाजिक छवि की चिंता भी करते थे।
  • माँ: अनपढ़ पर अत्यंत धैर्यवान और सहनशील; त्याग की मूर्ति।
  • शीला अग्रवाल: लेखिका को साहित्य और देश के आंदोलन से जोड़ने वाली प्रेरक प्राध्यापिका।
  • लेखिका: बचपन की हीन-भावना के बावजूद साहसी, सक्रिय और दृढ़ निश्चयी।

संदेश: बचपन में बच्चों की तुलना उनके मन पर गहरी और लंबी छाप छोड़ती है। सही मार्गदर्शन किसी के भीतर छिपी प्रतिभा को जगा सकता है। और एक साधारण लड़की भी साहस और दृढ़ निश्चय से असाधारण बन सकती है।

महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. लेखिका ने इस पाठ को आत्मकथा के बजाय आत्मकथ्य क्यों कहा है? उत्तर: क्योंकि इसमें उन्होंने अपने जीवन का सिलसिलेवार इतिहास नहीं लिखा, बल्कि केवल उन व्यक्तियों और घटनाओं पर ध्यान दिया जिन्होंने उनके लेखकीय व्यक्तित्व को प्रभावित किया।

प्रश्न 2. लेखिका के पिता के व्यक्तित्व में कौन-से परस्पर विरोधी गुण थे? उत्तर: वे एक ओर बेहद कोमल और संवेदनशील थे, तो दूसरी ओर अत्यंत क्रोधी, अहंवादी और शक्की थे।

प्रश्न 3. लेखिका के भीतर हीन-भावना पैदा होने का मुख्य कारण क्या था? उत्तर: पिता द्वारा लेखिका की तुलना उनकी गोरी और स्वस्थ बहन सुशीला से करना और हमेशा सुशीला की प्रशंसा करना ही इसका मुख्य कारण था।

प्रश्न 4. लेखिका अपनी माँ के त्याग को आदर्श क्यों नहीं बना सकीं? उत्तर: लेखिका को माँ का त्याग और सहनशीलता उनकी असहाय मजबूरी लगती थी, स्वेच्छा नहीं। इसलिए वे इसे अपना आदर्श नहीं बना सकीं।

प्रश्न 5. पिता रसोई को 'भटियारखाना' क्यों कहते थे? उत्तर: उनका मानना था कि रसोई में रहने से व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमता भट्टी में झोंक दी जाती है और वह केवल चूल्हे-चौके तक सीमित रह जाता है।

प्रश्न 6. शीला अग्रवाल ने लेखिका के जीवन को कैसे प्रभावित किया? उत्तर: उन्होंने लेखिका को अच्छी पुस्तकें चुनकर दीं, उन पर चर्चा की और उनकी साहित्यिक रुचि को सही दिशा दी। साथ ही उन्हें घर की चारदीवारी से निकालकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 7. पिता का क्रोध गर्व में क्यों बदल गया? उत्तर: जब पिता को पता चला कि पूरा कॉलेज लेखिका के एक इशारे पर खाली हो जाता है और कॉलेज में उनका बहुत प्रभाव है, तो बेटी की इस विशिष्टता को देखकर उनका क्रोध गर्व में बदल गया।

प्रश्न 8. लेखिका के व्यक्तित्व पर पिता का प्रभाव सकारात्मक था या नकारात्मक? उत्तर: दोनों। पिता ने उन्हें राजनीतिक बहसों में बैठने और विशिष्ट बनने की प्रेरणा दी, जो सकारात्मक था। वहीं सुशीला से तुलना करके उन्हें हीन-भावना से भर दिया, जो नकारात्मक था। इस तरह पिता के प्रोत्साहन ने उन्हें प्रखर वक्ता बनाया, पर तुलना ने उनके आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुँचाई।

बड़े प्रश्न में पहले दावा लिखें, फिर पाठ से प्रमाण दें और अंत में व्याख्या करें। पूरा पाठ NCERT की पाठ्यपुस्तक में पढ़ा जा सकता है। इस आत्मकथ्य को अच्छी तरह दोहराने के लिए Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।