7 October 20267 min readBy Learnijoy Team
लखनवी अंदाज़ कक्षा 10: क्षितिज भाग 2 अध्याय 9 सार और प्रश्न-उत्तर
यशपाल के व्यंग्य का पूरा सार, नवाब साहब का चरित्र, पाठ का संदेश, कठिन शब्द और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।
कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग 2 का अध्याय 9 "लखनवी अंदाज़" (Lakhnavi Andaz) यशपाल की व्यंग्य रचना है। इस लेख में आप पाठ का पूरा सार, नवाब साहब का चरित्र, पाठ का व्यंग्य और संदेश, कठिन शब्दों के अर्थ और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे। ट्रेन के एक छोटे-से दृश्य के ज़रिए यह पाठ पतनशील सामंती वर्ग के दिखावे और बिना कथ्य वाली कहानी, दोनों पर चोट करता है।
लेखक परिचय: यशपाल
यशपाल का जन्म 1903 में पंजाब के फ़िरोज़पुर छावनी में हुआ था। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से शिक्षा पाई, जहाँ उनका परिचय क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
वे यथार्थवादी रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में आम आदमी के सरोकार प्रमुख हैं और वे सामाजिक विषमता, राजनीतिक पाखंड और रूढ़ियों के विरुद्ध लिखते थे। उनका उपन्यास 'झूठा सच' भारत विभाजन की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज़ माना जाता है। उनकी भाषा स्वाभाविक और सजीव है।
पाठ का सार: शुरू से अंत तक
यात्रा की शुरुआत: लेखक को पास ही कहीं जाना था। भीड़ से बचने, एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए उन्होंने सेकंड क्लास का टिकट लिया। डिब्बे में पहले से एक सफ़ेदपोश सज्जन पालथी मारकर बैठे थे, जो लखनऊ की नवाबी नस्ल के लगते थे। उनके सामने तौलिए पर दो ताज़े-चिकने खीरे रखे थे। लेखक के आने से उनकी आँखों में एकांत भंग होने का असंतोष दिखा।
लेखक का अनुमान: लेखक ने सोचा कि नवाब साहब ने अकेले यात्रा करने और किफ़ायत के विचार से सेकंड क्लास लिया होगा, और अब उन्हें किसी साधारण व्यक्ति के सामने खीरे जैसी 'अपदार्थ' (तुच्छ) वस्तु खाने में संकोच हो रहा है। नवाब साहब ने बात करने में उत्साह नहीं दिखाया, तो लेखक ने भी आत्मसम्मान में उनसे आँखें चुरा लीं।
खीरे का निमंत्रण: अचानक नवाब साहब बोले, 'आदाब-अर्ज़, जनाब, खीरे का शौक़ फ़रमाएंगे?' लेखक को यह भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा कि नवाब साहब अपनी शराफ़त का भ्रम बनाए रखने के लिए उन्हें भी मामूली लोगों की हरकत में लपेटना चाहते हैं। लेखक ने शुक्रिया कहकर मना कर दिया।
खीरे की तैयारी: नवाब साहब ने बड़े करीने से खीरे धोए, पोंछे और उनके सिर काटकर, गोदकर झाग निकाला ताकि कड़वाहट निकल जाए। फिर छीलकर फाँकें तौलिए पर सजाईं और उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी छिड़की। लेखक देख रहे थे कि नवाब साहब के मुँह में पानी आ रहा था।
नवाब साहब का अनोखा रसास्वादन
नवाब साहब ने फिर पूछा, पर लेखक पहले मना कर चुके थे, इसलिए आत्मसम्मान बचाने के लिए दोबारा मना किया और बहाना बनाया कि उनका मेदा (आमाशय) कमज़ोर है।
इसके बाद नवाब साहब ने एक-एक फाँक उठाई, होंठों तक ले गए, सूंघी और स्वाद के आनंद में पलकें मूँद लीं। मुँह में आए पानी को गले से उतारा और फाँक खिड़की से बाहर फेंक दी। इसी तरह सारी फाँकें फेंककर उन्होंने हाथ-मुँह पोंछे और गर्व से लेखक की ओर देखा, मानो कह रहे हों कि यह है खानदानी रईसों का तरीका। लेखक सोच ही रहे थे कि क्या केवल सूंघने से पेट भर सकता है, तभी नवाब साहब ने ज़ोरदार डकार ली।
लेखक का निष्कर्ष: इस डकार से लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल गए। उन्होंने सोचा कि अगर खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर सकता है और डकार आ सकती है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के, केवल लेखक की इच्छा से 'नई कहानी' क्यों नहीं बन सकती?
नवाब साहब का चरित्र-चित्रण
- दिखावा-पसंद: वे खानदानी रईसी और नज़ाकत का प्रदर्शन करना चाहते थे।
- बनावटी: खीरा खाने की इच्छा थी, मुँह में पानी भी आया, फिर भी उसे सूंघकर फेंक दिया।
- विरोधाभासी: पहले बात करने में संकोच, फिर अचानक खीरे का निमंत्रण।
- नफ़ासत-पसंद: खीरे को बहुत करीने और सलीके से तैयार किया।
- यथार्थ से दूर: सूंघकर पेट भरने का भ्रम दिखाने के लिए डकार तक ली।
पाठ का व्यंग्य और संदेश
सामंती वर्ग पर व्यंग्य: नवाब साहब पतनशील सामंती वर्ग के प्रतीक हैं। पाठ में इस वर्ग को 'परजीवी संस्कृति' कहा गया है, जो श्रम और यथार्थ से कटकर केवल बनावटीपन के सहारे जी रही है। ऐसी सोच आज भी दिखती है, जो अपनी असलियत छिपाकर श्रेष्ठ होने का ढोंग करती है।
साहित्य पर व्यंग्य: लेखक व्यंग्य में कहते हैं कि बिना खाए डकार आ सकती है तो बिना कथ्य के कहानी भी लिखी जा सकती है। पर असल में वे कहना चाहते हैं कि जैसे बिना खाए पेट नहीं भरता, वैसे ही बिना विचार, घटना और पात्र के सार्थक कहानी नहीं लिखी जा सकती। यशपाल ने यह रचना यही साबित करने के लिए लिखी थी।
इस तरह यह पाठ एक साथ सामाजिक दिखावे और साहित्य-सृजन की एक प्रवृत्ति, दोनों पर प्रहार करता है।
कठिन शब्द और अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सफ़ेदपोश | भद्र व्यक्ति |
| अपदार्थ | तुच्छ समझी जाने वाली वस्तु |
| किफ़ायत | बचत |
| सुर्खी | लाल पाउडर (लाल मिर्च की) |
| मेदा | आमाशय |
| नफ़ासत | स्वच्छता, सफ़ाई |
| नज़ाकत | कोमलता, सुकुमारता |
| तस्लीम | सम्मान में; सम्मान जताने का संकेत |
| अमूर्त | जिसका कोई भौतिक अस्तित्व न हो |
| सकील | आसानी से न पचने वाला |
महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट क्यों लिया? उत्तर: भीड़ से बचने, एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने के लिए लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट लिया।
प्रश्न 2. लेखक के डिब्बे में आने पर नवाब साहब की क्या प्रतिक्रिया हुई? उत्तर: नवाब साहब की आँखों में एकांत भंग होने का असंतोष दिखा। उन्होंने लेखक से बात करने में कोई उत्साह नहीं दिखाया।
प्रश्न 3. नवाब साहब ने खीरे के सिर काटकर झाग क्यों निकाला? उत्तर: खीरे की कड़वाहट दूर करने के लिए। यह खीरा तैयार करने का पारंपरिक तरीका है, और इसे करीने से करना उनकी नवाबी शान भी दिखाता था।
प्रश्न 4. लेखक ने दूसरी बार खीरा खाने से मना क्यों किया? उत्तर: वे पहले ही मना कर चुके थे, इसलिए अपना आत्मसम्मान बनाए रखने के लिए उन्होंने दोबारा मना किया और बहाना बनाया कि उनका मेदा कमज़ोर है।
प्रश्न 5. नवाब साहब ने खीरे की फाँकें खिड़की से बाहर क्यों फेंक दीं? उत्तर: वे खानदानी रईसी और नज़ाकत का प्रदर्शन करना चाहते थे। वे दिखाना चाहते थे कि रईस लोग खीरे जैसी साधारण चीज़ खाते नहीं, केवल उसकी सुगंध से तृप्त हो जाते हैं।
प्रश्न 6. लेखक ने नवाब साहब को 'परजीवी संस्कृति' का प्रतिनिधि क्यों माना? उत्तर: क्योंकि वे वास्तविकता से बेखबर बनावटी जीवन जी रहे थे। वे श्रम और यथार्थ से दूर रहकर केवल दूसरों पर प्रभाव डालने के लिए दिखावा करते थे।
प्रश्न 7. नवाब साहब के व्यवहार में लेखक ने क्या विरोधाभास देखा? उत्तर: नवाब साहब पहले बात करने में संकोच करते हैं, फिर अचानक खीरा खाने का निमंत्रण देते हैं। वे खीरे को बड़ी मेहनत से तैयार करते हैं, पर खाने के बजाय सूंघकर फेंक देते हैं। यह विरोधाभास उनकी बनावटी रईसी और पाखंड को उजागर करता है।
प्रश्न 8. लेखक के अनुसार 'नई कहानी' का आधार क्या हो सकता है? उत्तर: लेखक व्यंग्य में कहते हैं कि अगर बिना खाए डकार आ सकती है, तो बिना पात्र, घटना और विचार के भी कहानी लिखी जा सकती है। पर वास्तव में वे कहना चाहते हैं कि कहानी के लिए ये तत्व अनिवार्य हैं।
उत्तर लिखते समय ध्यान रखें
यह पाठ केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि गिरती हुई सामाजिक व्यवस्था और साहित्य की नई प्रवृत्तियों पर कटाक्ष है। बड़े उत्तर में पहले दावा लिखें, फिर पाठ से साक्ष्य दें और अंत में व्याख्या करें। साक्ष्य के बिना उत्तर केवल निजी राय बनकर रह जाता है।
पूरा पाठ NCERT की पाठ्यपुस्तक में पढ़ा जा सकता है। इस व्यंग्य को और अच्छी तरह समझने के लिए Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।