7 October 20267 min readBy Learnijoy Team

नौबतखाने में इबादत कक्षा 10: क्षितिज अध्याय 11 सार, प्रश्न-उत्तर

उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर यतींद्र मिश्र के व्यक्ति-चित्र का पूरा सार, उनका व्यक्तित्व, पाठ का संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।

कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग 2 का अध्याय 11 "नौबतखाने में इबादत" (Naubatkhane Mein Ibadat) यतींद्र मिश्र का लिखा व्यक्ति-चित्र है। इस लेख में आप पाठ का शुरू से अंत तक सार, उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की विशेषताएँ, पाठ का संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे। यह पाठ प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, उनकी संगीत-साधना और काशी की सांस्कृतिक विरासत को दिखाता है।

परिचय: डुमराँव से काशी तक

बिस्मिल्ला खाँ का असली नाम अमीरुद्दीन था। उनका जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ। उनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के ही निवासी थे। वे पिता पैगंबर बख्श खाँ और माँ मिट्ठन के छोटे साहबजादे थे। पाँच-छह वर्ष की उम्र में वे अपने ननिहाल काशी आ गए।

डुमराँव का महत्व: शहनाई की रीड जिस नरकट (एक प्रकार की घास) से बनती है, वह मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारे मिलती है। इसीलिए शहनाई की दुनिया में डुमराँव को याद किया जाता है।

लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक कहा है, क्योंकि उन्होंने अस्सी वर्षों तक शहनाई से सुरों की साधना की और उसे विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया।

पाठ का सार: बचपन और संगीत की प्रेरणा

चौदह साल की उम्र में अमीरुद्दीन काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने में रियाज़ करने जाते थे। रास्ता गायिका बहनों रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर के पास से गुजरता था। उनके यहाँ से उठती ठुमरी, टप्पे और दादरा की आवाज़ों ने अमीरुद्दीन के मन में संगीत के प्रति आकर्षण जगाया। खाँ साहब ने खुद माना कि शुरुआती दिनों में संगीत की प्रेरणा इन्हीं बहनों से मिली।

बचपन में वे नाना को छुपकर शहनाई बजाते सुनते थे और बाद में नाना वाली मीठी शहनाई ढूँढने के लिए कई शहनाइयाँ फेंक देते थे। सम पर आने की तमीज़ उन्हें बचपन में ही मिल गई थी; तब वे दाद देने के लिए ज़मीन पर पत्थर पटकते थे।

शहनाई— सुषिर वाद्यों में शाह: फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य सुषिर वाद्य कहलाते हैं। अरब देशों में इन्हें 'नय' कहा जाता है। पाठ में शहनाई को सुषिर वाद्यों में शाह कहा गया है; यह उसकी मधुर, मांगलिक ध्वनि के प्रति सम्मान है। लेखक सोलहवीं शताब्दी के तानसेन की बंदिशों में इसके उल्लेख का संदर्भ भी देते हैं। दक्षिण भारत के नागस्वरम् की तरह शहनाई भी प्रभाती की मंगलध्वनि का पूरक है और शुभ अवसरों पर बजाई जाती है।

मुहर्रम, काशी और गंगा-जमुनी तहज़ीब

मुहर्रम का शोक: मुहर्रम में शिया मुसलमान इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति शोक (अज़ादारी) मनाते हैं। इन दस दिनों में खाँ साहब का खानदान न शहनाई बजाता, न किसी संगीत कार्यक्रम में जाता। आठवीं तारीख को खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर तक पैदल रोते हुए नौहा (शोक-गीत) बजाते जाते। उस दिन कोई राग नहीं बजता था।

काशी से प्रेम: खाँ साहब के लिए काशी और शहनाई से बढ़कर कोई जन्नत नहीं थी। वे कहते थे कि काशी छोड़कर कहीं नहीं जा सकते, क्योंकि यहाँ गंगा मैया, बाबा विश्वनाथ और बालाजी का मंदिर है। काशी से बाहर होने पर वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते और शहनाई का प्याला उसी ओर घुमा देते। काशी में संगीत, भक्ति और धर्म अलग नहीं हैं; यहाँ बिस्मिल्ला खाँ को गंगाद्वार से और विश्वनाथ को विशालाक्षी से अलग नहीं किया जा सकता।

सादगी और बदलते समय की व्यथा

भारत रत्न मिलने के बाद भी उनकी सादगी नहीं बदली। एक बार शिष्या ने उन्हें फटी तहमद (लुंगी) पहनने पर टोका। खाँ साहब ने मुस्कुराकर कहा कि भारत रत्न उन्हें शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। वे खुदा से यही माँगते थे कि फटा सुर न बख्शें, क्योंकि लुंगी आज फटी है तो कल सिल जाएगी, पर सुर का फटना अपूरणीय क्षति है। अस्सी बरस की उम्र में भी वे पाँचों वक्त की नमाज़ में सच्चे सुर की नेमत माँगते थे।

सन् 2000 के आसपास खाँ साहब को काशी के बदलाव खटकने लगे। पक्का महाल से मलाई-बर्फ बेचने वाले जा चुके थे और देसी घी की कचौड़ी-जलेबी में पहले वाला स्वाद नहीं रहा था। वे दुखी थे कि गायकों के मन में संगतकारों के लिए सम्मान नहीं रहा और घंटों का रियाज़ लुप्त हो रहा है। फिर भी उन्हें विश्वास था कि काशी आज भी संगीत के स्वर पर जागती और सोती है।

विरासत: 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उन्हें भारत रत्न, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी जैसे अनेक पुरस्कार मिले, फिर भी वे जिज्ञासु साधक बने रहे। वे दो कौमों को एक होने और भाईचारे से रहने की प्रेरणा देने वाले नायाब हीरे थे।

बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व और पाठ का संदेश

  • सच्चे साधक: शहनाई को खुदा की इबादत और सुर की प्रार्थना मानते थे।
  • सरल और सादे: प्रसिद्धि के बावजूद फटी तहमद में भी संकोच नहीं।
  • धार्मिक पर कट्टर नहीं: मुहर्रम का शोक भी मनाते थे और विश्वनाथ व बालाजी के प्रति अटूट श्रद्धा भी रखते थे।
  • काशी के प्रेमी: गंगा-जमुनी तहज़ीब के जीवंत प्रतीक।
  • विनम्र और जिज्ञासु: अस्सी वर्षों तक संगीत को पूरी तरह सीखने की ललक जीवित रखी।

संदेश: कला की साधना के लिए धैर्य, समर्पण और विनम्रता ज़रूरी है। बाहरी चमक-धमक से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक साधना और कला की शुद्धता है।

महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है? उत्तर: शहनाई की रीड बनाने के लिए ज़रूरी नरकट मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारे मिलती है, इसलिए डुमराँव को याद किया जाता है।

प्रश्न 2. अमीरुद्दीन को संगीत की प्रारंभिक प्रेरणा किससे मिली? उत्तर: बालाजी मंदिर जाने के रास्ते में पड़ने वाले रसूलनबाई और बतूलनबाई नामक गायिका बहनों के गीत सुनकर उन्हें संगीत की प्रारंभिक प्रेरणा मिली।

प्रश्न 3. शहनाई को सुषिर वाद्यों में शाह क्यों कहा गया है? उत्तर: शहनाई की मधुर और मांगलिक ध्वनि को सम्मान देने के लिए। इसे शुभ अवसरों से जुड़ा वाद्य माना गया है।

प्रश्न 4. लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा है? उत्तर: क्योंकि उन्होंने अस्सी वर्षों तक शहनाई के माध्यम से सुरों की साधना की और शहनाई को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया।

प्रश्न 5. मुहर्रम के दिनों में बिस्मिल्ला खाँ क्या करते थे? उत्तर: मुहर्रम के दस दिनों तक वे शहनाई नहीं बजाते थे और किसी संगीत कार्यक्रम में नहीं जाते थे। आठवीं तारीख को वे दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर तक पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे और इमाम हुसैन के प्रति संवेदना प्रकट करते थे।

प्रश्न 6. काशी से बाहर होने पर खाँ साहब अपनी श्रद्धा कैसे प्रकट करते थे? उत्तर: वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते थे और कुछ देर उसी ओर शहनाई बजाते थे।

प्रश्न 7. शिष्या के टोकने पर खाँ साहब ने फटी तहमद के बारे में क्या कहा? उत्तर: उन्होंने कहा कि भारत रत्न उन्हें शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। लुंगी फटी है तो कल सिल जाएगी, पर सुर फटना नहीं चाहिए। उनके लिए सुर की पवित्रता कपड़ों से अधिक महत्वपूर्ण थी।

प्रश्न 8. काशी के किन बदलावों से खाँ साहब दुखी थे? उत्तर: पक्का महाल से मलाई-बर्फ वालों का चले जाना, कचौड़ी-जलेबी का बदला हुआ स्वाद, संगतकारों के प्रति घटता सम्मान, घटता रियाज़ और संगीत, साहित्य व अदब की लुप्त होती परंपराएँ उन्हें दुखी करती थीं।

बड़े प्रश्न, जैसे "बिस्मिल्ला खाँ सच्चे इंसान क्यों थे", में दावा, पाठ से प्रमाण और व्याख्या— तीनों लिखें। पूरा पाठ NCERT की पाठ्यपुस्तक में पढ़ा जा सकता है। इस पाठ को आसानी से दोहराने के लिए Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।