7 October 20267 min readBy Learnijoy Team

नेताजी का चश्मा कक्षा 10: सारांश, प्रश्न-उत्तर (क्षितिज अध्याय 7)

स्वयं प्रकाश की कहानी का शुरू से अंत तक सारांश, पात्र-परिचय, चश्मों के प्रतीक, संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।

कक्षा 10 हिंदी क्षितिज भाग 2 का अध्याय 7 नेताजी का चश्मा (Netaji ka Chashma) स्वयं प्रकाश की कहानी है। एक कस्बे में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा और एक साधारण चश्मेवाले के माध्यम से यह कहानी बताती है कि देशभक्ति का असली अर्थ क्या है। इस लेख में आप कहानी का पूरा सारांश, पात्र, प्रतीक, संदेश और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे।

लेखक परिचय: स्वयं प्रकाश

  • स्वयं प्रकाश (1947-2019) समकालीन हिंदी कहानी के महत्त्वपूर्ण लेखक हैं। उन्होंने मध्यमवर्गीय जीवन की विसंगतियाँ अपनी रचनाओं में दिखाईं।
  • उनका जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ी और राजस्थान में एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में लंबे समय तक काम किया।
  • वे वसुधा पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे।
  • उनकी कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना और जाति, संप्रदाय, लिंग के भेदभाव के खिलाफ़ स्वर है। उनकी शैली रोचक किस्सागोई की है।
  • प्रमुख कहानी संग्रह: सूरज कब निकलेगा, आदमी जात का आदमी।

सारांश: कस्बा और नेताजी की प्रतिमा

कहानी एक छोटे कस्बे की है। वहाँ कुछ पक्के मकान, एक बाज़ार, लड़के-लड़कियों के स्कूल और सीमेंट का एक छोटा कारखाना था। नगरपालिका कुछ न कुछ काम करवाती रहती थी: कभी सड़कें पक्की करवाना, कभी पेशाबघर बनवाना, कभी कबूतरों की छतरी बनवाना, कभी कवि सम्मेलन करवाना।

इसी उत्साह में एक प्रशासनिक अधिकारी ने मुख्य चौराहे पर नेताजी की संगमरमर की प्रतिमा लगवाई। प्रतिमा बस्ट थी, यानी टोपी से कोट के दूसरे बटन तक। फ़ौजी वर्दी में नेताजी सुंदर और मासूम लगते थे, और प्रतिमा देखते ही दिल्ली चलो जैसे नारे याद आने लगते थे।

सारांश: चश्मे की कमी और कैप्टन

प्रतिमा में एक कमी थी: नेताजी की आँखों पर संगमरमर का चश्मा नहीं था। लेखक अनुमान लगाते हैं कि शायद बजट कम था या अच्छे मूर्तिकार की जानकारी नहीं थी, इसलिए यह काम स्थानीय ड्राइंग मास्टर मोतीलाल को मिला होगा। उन्होंने महीने भर में मूर्ति बना दी, पर पत्थर का पारदर्शी चश्मा नहीं बना पाए होंगे, या चश्मा टूट गया होगा।

किसी ने मूर्ति पर असली, चौड़े काले फ्रेम वाला चश्मा पहना दिया था। हालदार साहब ने पहली बार यह देखा तो चकित होकर मुस्कुरा उठे: 'मूर्ति पत्थर की, लेकिन चश्मा रियल'।

पानवाले से पता चला कि यह काम कैप्टन नाम का चश्मेवाला करता है। वह कोई फ़ौजी नहीं, बल्कि एक बूढ़ा, मरियल, लंगड़ा आदमी था जो फेरी लगाकर चश्मे बेचता था। बिना चश्मे की मूर्ति उसे आहत करती थी, इसलिए वह अपने फ्रेमों में से एक मूर्ति पर लगा देता। कोई ग्राहक वैसा ही फ्रेम माँगता, तो वह नेताजी से क्षमा माँगकर उसे उतार देता और मूर्ति पर नया फ्रेम लगा देता।

सारांश: कैप्टन की मृत्यु और सरकंडे का चश्मा

दो साल तक हालदार साहब मूर्ति पर बदलते चश्मे देखते रहे। फिर एक दिन मूर्ति बिना चश्मे के थी। पानवाले ने भारी मन से बताया: 'साहब! कैप्टन मर गया।' हालदार साहब बहुत दुखी हुए। उन्हें लगा कि अब मूर्ति हमेशा बिना चश्मे के रहेगी। वे सोचने लगे कि उस कौम का क्या होगा जो देश के लिए सब कुछ त्यागने वालों पर हँसती है।

अगली बार उन्होंने तय किया कि वे मूर्ति की तरफ़ नहीं देखेंगे। पर आदत से मजबूर होकर नज़र पड़ ही गई, और वे ठिठक गए। मूर्ति की आँखों पर बच्चों का बनाया सरकंडे का छोटा-सा चश्मा रखा था। हालदार साहब भावुक होकर अटेंशन की मुद्रा में खड़े हो गए।

पात्र और प्रतीक

  • हालदार साहब: संवेदनशील व्यक्ति, जो मूर्ति पर बदलते चश्मे देखते हैं और देशभक्तों के उपहास पर दुखी होते हैं।
  • कैप्टन: गरीब, शारीरिक रूप से कमज़ोर, पर नेताजी के प्रति सम्मान से भरा चश्मेवाला। कहानी उसके उपनाम की सटीक उत्पत्ति तय करके नहीं बताती।
  • पानवाला: खुशमिज़ाज, काला, मोटा; मुँह में पान ठूँसे रहता और बात-बात पर हँसता। वह कैप्टन को पागल और लंगड़ा कहकर मज़ाक उड़ाता है, पर उसकी मृत्यु पर आँखें पोंछता है। इसमें उसकी छिपी संवेदना दिखती है।
चश्माप्रतीकात्मक अर्थ
संगमरमर का चश्मा (नहीं था)व्यवस्था की लापरवाही और मूर्तिकार की भूल
कैप्टन का असली चश्माएक व्यक्ति की निजी देशभक्ति और सम्मान
सरकंडे का चश्मानई पीढ़ी में देशभक्ति की निरंतरता और उम्मीद

संदेश और भाषा

कहानी बताती है कि देशभक्ति किसी बड़े पद, शक्ति या फ़ौजी वर्दी की मोहताज नहीं। हर नागरिक, बच्चा हो या बूढ़ा, अपने छोटे कामों से देश के प्रति प्रेम दिखा सकता है। व्यंग्य के माध्यम से लेखक उस मानसिकता पर चोट करते हैं जो देशभक्तों का उपहास उड़ाती है।

भाषा सरल और बोलचाल की है। आइडिया, रियल, फ्रेम जैसे अंग्रेज़ी शब्द और स्थानीय बोली के शब्द हैं, जैसे गिराक (ग्राहक) और किदर (किधर)। ये बातचीत को कस्बे के माहौल से जोड़ते हैं।

अध्याय के अंत में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक अलग पूरक अंश है। उसके अनुसार देश-प्रेम का अर्थ है देश के मनुष्य, पशु-पक्षी, नदी, वन, पर्वत आदि सबसे प्रेम और उनके साथ साहचर्य का भाव।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 1)

प्रश्न 1. नगरपालिका ने कस्बे में कौन-कौन से काम करवाए थे? उत्तर: सड़कें पक्की करवाईं, पेशाबघर बनवाए, कबूतरों की छतरी बनवाई, कवि सम्मेलन करवाए और चौराहे पर नेताजी की प्रतिमा लगवाई।

प्रश्न 2. मूर्ति पर असली चश्मा देखकर हालदार साहब क्यों मुस्कुराए? उत्तर: प्रतिमा में संगमरमर का चश्मा नहीं था। किसी ने असली चश्मा पहनाकर वह कमी पूरी की थी और नेताजी के प्रति सम्मान दिखाया था। यह विचार उन्हें अच्छा लगा।

प्रश्न 3. कैप्टन मूर्ति का चश्मा बार-बार क्यों बदलता था? उत्तर: बिना चश्मे की मूर्ति उसे आहत करती थी, इसलिए वह अपना एक फ्रेम उस पर लगा देता था। जब कोई ग्राहक वही फ्रेम माँगता, तो वह नेताजी से क्षमा माँगकर उसे उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर नया फ्रेम लगा देता।

प्रश्न 4. पानवाले ने कैप्टन का मज़ाक कैसे उड़ाया? उत्तर: उसने कैप्टन को पागल कहा और कहा कि वह लंगड़ा फ़ौज में क्या जाएगा।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 2)

प्रश्न 5. कैप्टन की मृत्यु के बाद हालदार साहब क्यों दुखी थे? उत्तर: उन्हें लगा कि अब मूर्ति हमेशा बिना चश्मे के रहेगी, क्योंकि मूर्तिकार चश्मा बनाना भूल गया था और चश्मा पहनाने वाला कैप्टन नहीं रहा। उन्हें यह भी दुख था कि लोग देश के लिए त्याग करने वालों पर हँसते हैं।

प्रश्न 6. सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है? उत्तर: यह कि नई पीढ़ी के मन में भी देश के नायकों के प्रति सम्मान और देशभक्ति ज़िंदा है।

प्रश्न 7. पानवाले के चरित्र में क्या बदलाव दिखता है? उत्तर: शुरू में वह कैप्टन का मज़ाक उड़ाता है, पर उसकी मृत्यु पर उदास होकर आँसू पोंछता है। इससे उसके भीतर छिपी मानवीय संवेदना दिखती है।

प्रश्न 8. नेताजी का चश्मा कहानी का मुख्य संदेश क्या है? उत्तर: दावा: देशभक्ति किसी पद या शक्ति की मोहताज नहीं। साक्ष्य: गरीब और शारीरिक रूप से कमज़ोर कैप्टन अपनी सामर्थ्य से मूर्ति पर चश्मा लगाकर कर्तव्य निभाता है, और बाद में बच्चे सरकंडे का चश्मा लगाते हैं। व्याख्या: हर नागरिक अपने छोटे कामों से देश-प्रेम प्रकट कर सकता है।

आम गलतियाँ

  • कैप्टन को फ़ौजी या सैनिक लिखना। पानवाला साफ़ करता है कि वह सैनिक नहीं था।
  • शुक्ल जी के पूरक अंश को कहानी का हिस्सा मान लेना। वह अलग पाठ है।
  • सरकंडे के चश्मे का प्रतीकात्मक अर्थ न लिखना। यही कहानी की उम्मीद है।

कहानी के पात्र और प्रतीक फिर से समझने हों, तो Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।