7 October 20266 min readBy Learnijoy Team

पर्वत प्रदेश में पावस कक्षा 10: भावार्थ और प्रश्न-उत्तर

सुमित्रानंदन पंत की कविता का दृश्य-दर-दृश्य भावार्थ, अलंकार, कठिन शब्द और बोर्ड परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर।

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श भाग 2 का अध्याय 4 पर्वत प्रदेश में पावस (Parvat Pradesh Mein Pavas) है, जिसे सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है। कविता बताती है कि वर्षा ऋतु में पहाड़ों पर प्रकृति हर पल कैसे अपना रूप बदलती है। इस लेख में आप हर दृश्य का भावार्थ, अलंकार, कठिन शब्द और परीक्षा के लिए प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे।

कवि परिचय: सुमित्रानंदन पंत

  • सुमित्रानंदन पंत (1900-1977) छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।
  • उनका जन्म उत्तराखंड के कौसानी (अल्मोड़ा) में हुआ था।
  • प्रकृति की गोद में पलने के कारण उनकी कविताओं में प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य भरा है। उन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है।
  • प्रमुख कृतियाँ: वीणा, पल्लव, युगवाणी और चिदंबरा।
  • उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • उनकी शैली कोमल, मधुर और उपमाओं से सजी होती है।

भावार्थ: पल-पल बदलता प्रकृति-वेश

पर्वत प्रदेश में पावस (वर्षा ऋतु) के समय प्रकृति हर पल अपना रूप बदल रही है। कभी धूप खिलती है, तो कभी अचानक घने बादल छा जाते हैं। प्रकृति-वेश का अर्थ है प्रकृति का पहनावा या रूप। कवि ने प्रकृति का मानवीकरण किया है, मानो वह कोई स्त्री हो जो बार-बार अपने वस्त्र बदल रही हो।

भावार्थ: मेखलाकार पर्वत और दर्पण-सा ताल

पर्वत मेखलाकार, यानी करधनी के आकार का है, जो धरती को घेरे हुए लगता है। उस पर खिले हज़ारों फूल पर्वत की आँखों जैसे लगते हैं। कवि ने इन्हें दृग-सुमन (फूल रूपी आँखें) कहा है।

पर्वत के चरणों में फैला तालाब दर्पण (आईने) जैसा है। पर्वत इन हज़ारों आँखों से उस स्वच्छ जल में अपना विशाल आकार निहार रहा है, मानो अपनी ही सुंदरता पर मुग्ध हो।

दृश्यकवि की कल्पना
मेखलाकार पर्वतकरधनी जैसा गोल और विशाल पहाड़
हज़ार दृग-सुमनपहाड़ पर खिले फूल, जो आँखों जैसे लगते हैं
दर्पण रूपी तालपहाड़ के चरणों में आईने जैसा तालाब

भावार्थ: झरने और ऊँचे वृक्ष

झरने: झरने झर-झर करते बह रहे हैं। कवि को लगता है कि वे पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं। उनकी आवाज़ सुनकर नस-नस में उत्साह भर जाता है। झाग भरे सफ़ेद झरने मोतियों की लड़ियों जैसे लगते हैं, मानो पहाड़ के गले में मोतियों की मालाएँ लटक रही हों।

वृक्ष: पहाड़ पर उगे शाल के ऊँचे पेड़ शांत आकाश को अनिमेष (बिना पलक झपकाए) देख रहे हैं। वे स्थिर और अटल हैं, पर ऐसा लगता है मानो किसी गहरी चिंता में डूबे हों। ये पेड़ मनुष्य की ऊँची आकांक्षाओं के प्रतीक हैं, जो मौन रहकर आकाश छूना चाहते हैं।

भावार्थ: इंद्र का जादुई खेल

अचानक मौसम बदलता है। लगता है जैसे पर्वत पारे के समान चमकीले पंख फड़फड़ाकर कहीं उड़ गया हो। चारों ओर धुंध छा जाती है और केवल झरनों का शोर (रव-शेष) सुनाई देता है। धुंध ऐसी उठती है मानो तालाब में आग लग गई हो और धुआँ निकल रहा हो।

कोहरे में छिपे शाल के पेड़ मानो सभय (डरे हुए) होकर धरती में धँस गए हों। कवि कहते हैं कि वर्षा के देवता इंद्र अपने बादल रूपी विमान (जलद-यान) पर बैठकर यह जादुई खेल (इंद्रजाल) दिखा रहे हैं।

दृश्यकवि की कल्पना
बादलों का छानापर्वत का पंख लगाकर उड़ जाना
धुंध का उठनातालाब में आग लगकर धुआँ निकलना
तेज़ वर्षाआकाश का धरती पर टूट पड़ना
बदलता मौसमइंद्र का जादुई खेल (इंद्रजाल)

काव्य सौंदर्य और अलंकार

  • मानवीकरण: इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता। पर्वत, पेड़ और झरने मनुष्य की तरह देखते, गाते और डरते हैं।
  • उपमा: 'दर्पण-सा फैला है विशाल', मोतियों की लड़ियों-से झरने।
  • रूपक: दृग-सुमन।
  • पुनरुक्ति प्रकाश: झर-झर, पल-पल। इससे लय पैदा होती है।
  • पंत जी ने भाषा को चित्रों की तरह सजाया है।

याद रखें: मेखला = करधनी, अनिमेष = बिना पलक झपकाए, रव = आवाज़, जलद = बादल, सभय = भय के साथ, इंद्रजाल = जादू का खेल।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 1)

प्रश्न 1. पंत जी को किस प्रकार का कवि कहा जाता है? उत्तर: प्रकृति का सुकुमार कवि, क्योंकि उनकी रचनाओं में प्रकृति के कोमल और सुंदर रूपों का अद्भुत वर्णन मिलता है।

प्रश्न 2. 'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' का क्या अर्थ है? उत्तर: वर्षा ऋतु में पहाड़ों पर मौसम बहुत तेज़ी से बदलता है, इसलिए प्रकृति का रंग-रूप हर क्षण नया लगता है।

प्रश्न 3. कवि ने मेखलाकार शब्द का प्रयोग क्यों किया है? उत्तर: मेखलाकार का अर्थ है करधनी के समान गोल। इससे पर्वत की विशालता और फैलाव दिखता है, जो धरती को घेरे हुए लगता है।

प्रश्न 4. झरनों की तुलना किससे की गई है और क्यों? उत्तर: मोतियों की लड़ियों से, क्योंकि गिरते हुए सफ़ेद झाग वाले झरने मोतियों की माला की तरह चमकते हैं।

महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (भाग 2)

प्रश्न 5. पेड़ आकाश की ओर किस प्रकार देख रहे हैं? उत्तर: अनिमेष, यानी बिना पलक झपकाए, स्थिर और शांत होकर, मानो किसी गहरी चिंता या ऊँची आकांक्षा में लीन हों।

प्रश्न 6. 'इंद्र खेलता इंद्रजाल' से कवि का क्या तात्पर्य है? उत्तर: वर्षा ऋतु में पल-पल बदलते दृश्य किसी जादू जैसे लगते हैं, मानो वर्षा के देवता इंद्र अपनी माया से इन्हें रच रहे हों।

प्रश्न 7. 'दर्पण-सा फैला है विशाल' में कौन-सा अलंकार है? उत्तर: उपमा अलंकार, क्योंकि तालाब की तुलना उसकी स्वच्छता और चमक के कारण दर्पण से की गई है।

प्रश्न 8. शाल के वृक्ष धरती में क्यों धँस गए? उत्तर: दावा: अचानक छाए बादलों और कोहरे में छिपकर शाल के पेड़ धरती में धँसते हुए प्रतीत होते हैं। प्रमाण: कवि उन्हें सभय (डरे हुए) बताते हैं और उठती धुंध को ताल के जलने की कल्पना से जोड़ते हैं। व्याख्या: पेड़ों का ओझल होना मानवीकरण से व्यक्त है; पेड़ सचमुच डरकर ज़मीन में नहीं घुसते।

आम गलतियाँ

  • पेड़ों के धँसने को सच्ची घटना लिखना। यह कोहरे में ओझल होने की कल्पना है।
  • दृग-सुमन को उपमा बताना। यहाँ रूपक है।
  • केवल दृश्य बताना, अलंकार न बताना। उत्तर में मानवीकरण, उपमा या रूपक की पहचान भी साथ लिखें।

हर दृश्य की कल्पना फिर से समझनी हो, तो Learnijoy पर Joy के साथ यह अध्याय पढ़ें।